ट्रांसमिशन में देरी से ग्रिड की खामी आई सामने, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में हुई 51.5% की कटौती

punjabkesari.in Monday, Apr 20, 2026 - 07:05 PM (IST)

गुड़गांव ब्यूरो : राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा की कटौती मार्च से अगस्त 2025 के बीच 8.5% से बढ़कर 51.5% तक पहुंच गई। इनगवर्न की एक रिपोर्ट, जिसमें केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के आंकड़ों का हवाला दिया गया है, के अनुसार इस स्थिति से लगभग 4 गीगावॉट पवन और सौर ऊर्जा क्षमता प्रभावित हुई। रिपोर्ट के अनुसार, यह तेज़ बढ़ोतरी उत्पादन क्षमता और ट्रांसमिशन तैयारियों के बीच बढ़ती खाई को दर्शाती है। जहां एक ओर नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र तेजी से स्थापित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बिजली निकासी के लिए जरूरी ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसे मुख्य रूप से पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (पीजीसीआईएल) विकसित और संचालित करती है, उस गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा।


 
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई अंतरराज्यीय ट्रांसमिशन परियोजनाओं में 6 से 24 महीने तक की देरी हो रही है। ये परियोजनाएं नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों से बिजली निकालने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। कुछ मामलों में, तय समयसीमा का लगभग 28% समय बीत जाने के बावजूद परियोजनाओं में केवल 3% तक ही भौतिक प्रगति दर्ज की गई, जिससे आगे और देरी की आशंका बढ़ गई है। इस असंतुलन का सीधा आर्थिक असर भी सामने आ रहा है। ऊर्जा कटौती से नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स की आय घटती है और उत्पादन परिसंपत्तियों में लगाए गए निवेश पर रिटर्न कमजोर होता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि कुल फंसी हुई या आंशिक रूप से प्रभावित क्षमता 6 से 8 गीगावॉट तक हो सकती है।


 
संरचनात्मक स्तर पर, इस समस्या की एक बड़ी वजह क्षेत्र में अत्यधिक एकाग्रता है। चूंकि ट्रांसमिशन परियोजनाओं का अधिकांश हिस्सा पीजीसीआईएल के पास है, इसलिए उसकी परियोजनाओं में देरी पूरे सिस्टम में बिजली निकासी की बाधा बन जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक ही प्रमुख खिलाड़ी पर अधिक निर्भरता से सेक्टर की झटकों को संभालने की क्षमता सीमित हो जाती है। इस स्थिति को सुधारने के लिए इनगवर्न ने परियोजनाओं के आवंटन में अधिक डेवलपर्स की भागीदारी बढ़ाने की सिफारिश की है। इसमें किसी एक कंपनी को अत्यधिक परियोजनाएं देने पर सीमा तय करने का सुझाव भी शामिल है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बोली प्रक्रिया में अधिक यथार्थवादी अनुमान अपनाने की जरूरत है, क्योंकि जिन प्रोजेक्ट्स के 24 महीने में पूरे होने की उम्मीद लगाई जाती हैं, वे मंजूरी संबंधी देरी के कारण अब लगभग 36 महीने ले रहे हैं।


 
इसके अलावा, रिपोर्ट ने नियामकों और नीति निर्माताओं से परियोजनाओं की प्रगति और देरी से होने वाले वित्तीय प्रभावों की नियमित जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि ट्रांसमिशन की वास्तविक स्थिति की बेहतर निगरानी हो सके। भारत जब 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब यह रिपोर्ट बताती है कि अब सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनता जा रहा है। इसे दूर करने के लिए केवल तेज़ निष्पादन ही नहीं, बल्कि अधिक संतुलित, पारदर्शी और व्यापक विकास मॉडल की भी आवश्यकता होगी।


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Content Editor

Gaurav Tiwari

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