हरियाणा में एक और बड़ा घोटाला, फर्म से मिलीभगत करके अधिकारी कर गए करोड़ों का गबन

8/9/2020 4:17:10 PM

यमुनानगर (सुरेंद्र मेहता): हरियाणा में एक के बाद एक घोटाले उजागर हो रहे है। शराब, चावल और रजिस्ट्री घोटाले के बाद अब यमुनानगर के बिजली निगम के कंस्ट्रक्शन विभाग में 6 करोड़ का घोटाला सामने आया है। इसको लेकर कंस्ट्रक्शन विभाग के ही एसडीओ ने एफआईआर दर्ज करवाई है। 

मामले की शिकायत पर जांच कमेटी गठित की गई। कमेटी की जांच में फर्म अरविंद्रो इलेक्ट्रिकल व बिजली निगम के अधिकारियों की मिलीभगत सामने आई है। अब इस मामले में बिजली निगम निर्माण के एसडीओ संदीप पाहुजा की शिकायत पर तत्कालीन अधिकारियों व अरविंद्रो इलेक्ट्रिकल फर्म पर धोखाधड़ी व गबन केस दर्ज हुआ है। जिसकी जांच यमुनानगर के थाना गांधीनगर पुलिस कर रही है।

पुलिस को दी शिकायत में बताया गया है कि फर्म अरविंद्रा इलेक्ट्रिकल चंडीगढ़ को 20 अगस्त 2014 को 11 केवी लाइन के नए निर्माण में 20 स्क्वायर मिमी एल्युमिनियम कंडक्टर स्टील रीनफोर्स के साथ सामग्री उपकरण आपूर्ति, इरेक्शन व 30 स्क्वायर कंडक्टर को हटाने का ठेका दिया गया। इसके स्थान पर 11 केवी लाइन 80 स्क्वायर एल्युमिनियम कंडक्टर स्टील रीनपोर्स व एबी केबल के साथ जोड़ना था।

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कार्य पूरा होने से पहले ही राशि कर दी जारी
यह कार्य 19 मई 2015 तक पूरा होना था। तय समय पर यह कार्य पूरा नहीं हुआ, जबकि बिजली निगम के एसडीओ व अन्य अधिकारियों ने मिलीभगत कर अरविंद्रा इलेक्ट्रिकल को 10 करोड़ 16 लाख 681 रुपये जारी कर दिए। मौके पर कार्य पूरा नहीं हुआ था। 33 फीडर में से 19 फीडर पर ही कार्य हुआ। करीब छह करोड़ रुपये का यह गबन किया गया।

एसडीओ की मिलीभगत से हुआ यह घोटाला
तत्कालीन एसडीओ जो कि बिजली निगम के कंस्ट्रक्शन विभाग में थे उनकी मिलीभगत से यह घोटाला हुआ। इस मामले की शिकायत हुई, तो 20 नवंबर 2019 को जांच कमेटी गठित की गई। इस कमेटी में 5 कार्यकारी अभियंता भी शामिल थे। कमेटी ने आरोपित फर्म अरविंद्रा इलेक्ट्रिकल को जांच में शामिल होने के लिए 22 नवंबर, 23 दिसंबर व 30 दिसंबर 2019 को नोटिस भेजे, लेकिन वहां से कोई भी जांच में शामिल नहीं हुआ। 

नोटिस दिए जाने के बाद भी फर्म ने पैसे की भरपाई नहीं की
24 जनवरी 2020 को कमेटी ने इस मामले में रिपोर्ट दी। जिसके आधार पर निगम को छह करोड़ नौ लाख 4 हजार 331 रुपये का घोटाला मिला। इस मामले में निगम के पैसे की भरपाई करने के लिए अरविंद्रा इलेक्ट्रिकल को 27 फरवरी 2020 को नोटिस दिया गया, लेकिन फर्म की ओर से यह भरपाई नहीं की गई।

कर्मचारियों ने अपने पदों का गलत फायदा उठा फर्म को लाभ पहुंचाया
तत्कालीन कनिष्ठ अभियंता निर्माण सतीश कुमार, एसडीओ निर्माण बलवान सिंह, कार्यकारी अभियंता निर्माण करनाल केएस भोरिया, एसके मक्कड, लेखाकार नफे सिंह की मिलीभगत से यह गबन किया गया। कमेटी ने जांच रिपोर्ट में इन अफसरों को भी दोषी बनाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अधिकारियों व कर्मचारियों को निगम के हितों को संरक्षित करना था, लेकिन इन्होंने अपने पदों का गलत फायदा उठाया और फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाया। इस अवैध कार्य में इन व्यक्तियों के सम्मिलित होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इन्होंने षड्यंत्र के तहत यह अपराध किया है।

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2015 में ठेकेदार को दिया गया था 13 करोड़ 80 लाख का कार्य 
इस मामले में बिजली विभाग के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर योगराज सिंह ने बताया कि 2015 में विभाग द्वारा एक ठेकेदार को 13 करोड़ 80 लाख का कार्य दिया गया था, जिसमें सवा करोड़ लेबर कॉन्पोनेंट के लिए था और 12 करोड़ 30 लाख का मटेरियल था, जो सप्लाई करके लगाना था यमुनानगर जिले में। उस ठेकेदार ने कुछ काम कर दिए थे कुछ कार्य अधूरे पड़े थे। 

जितनी पेमेंट हो चुकी है उस हिसाब से काम नहीं किया
अधूरे किसी भी वजह से हो सकते हैं फॉरेस्ट प्रॉब्लम या कुछ और उसको 10 करोड़ से ज्यादा की पेमेंट हो गई थी। लेकिन ठेकेदार काम पूरा नहीं कर पाया था। जितनी पेमेंट इनकी हो चुकी है उस हिसाब से उन्होंने काम नहीं किया। विभाग ने कमेटी बनाकर चेक करवाया, जिसमें चार करोड़ से अधिक का मटेरियल साइट पर पाया गया जो ठेकेदार की कंपनी द्वारा लगाया गया था। 

लगभग 6 करोड़ रुपए का कार्य भी अधूरा है। बिजली निगम को उसकी भरपाई नहीं की गई, अगर को ठेकेदार कर देता तो 10 करोड़ की जो पेमेंट हुई वो ठीक थी। फिर यह मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, रिटायर्ड जस्टिस द्वारा उसकी एक इंक्वायरी चल रही है। ठेकेदार की फर्म काम पूरे नहीं कर पाई का कारण कोई भी हो सकता है।

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बिजली निगम के कंस्ट्रक्शन विभाग की तरफ से इसमे एफआईआर करवाई गई है। कंस्ट्रक्शन विभाग द्वारा ही कार्य करवाया गया था। बाकी मेरे विभाग की और जहां तक मेरे कार्यालय की बात है। मेरे कार्यालय के किसी भी कर्मचारी की इसमें किसी प्रकार की इंवॉल्वमेंट नहीं है। ये सारा कार्य कंस्ट्रक्शन विभाग द्वारा करवाया गया।

इस तरह के घोटाले बिना अधिकारियों की मिलीभगत से नहीं हो सकते। करोड़ों के इस घोटाले को लेकर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच में निगम के ही कुछ तत्कालीन अधिकारियों पर सवाल उठाए हैं और उनकी मिलीभगत की बात कही है। अब देखना होगा निगम ऐसे अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करता है।


Edited By

vinod kumar

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