साधारण परिवार में जन्मे अनिल विज ने अपने दम पर राजनीति में बनाई पहचान, कहा जाता है "सिंगल मैन आर्मी"
punjabkesari.in Saturday, May 30, 2026 - 06:59 PM (IST)
चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा की राजनीति में यदि किसी नेता को "सिंगल मैन आर्मी" कहा जाता है तो वह नाम है परिवहन, ऊर्जा एवं श्रम मंत्री अनिल विज का। पिछले लगभग पांच दशकों से भाजपा और राष्ट्रवादी राजनीति का एक मजबूत चेहरा रहे विज आज भी अपनी अलग कार्यशैली, बेबाकी और जनसंपर्क के लिए जाने जाते हैं। हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद 2014, 2019 और अब 2024 में भी वे लगातार कैबिनेट मंत्री बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनका राजनीतिक सामंजस्य भी वर्षों पुराना है। कश्मीर के लाल चौक में तिरंगा फहराने के ऐतिहासिक अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी और अनिल विज की निकटता पूरे देश ने देखी थी। विशेष बात यह है कि अनिल विज कभी अपने राजनीतिक संबंधों या प्रभाव का प्रचार करने के आदी नहीं रहे। पांच दशक की सक्रिय राजनीति के बावजूद आज भी वे आम कार्यकर्ता की तरह लोगों से मिलते हैं। हरियाणा में हजारों ऐसे लोग हैं जिन्हें विज आज भी नाम लेकर संबोधित करते हैं।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
15 मार्च 1953 को जन्मे अनिल विज ने राजनीति की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से की। अंबाला छावनी के एसडी कॉलेज में अध्ययन के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। वर्ष 1970 में एबीवीपी ने उन्हें महासचिव बनाया। इसके बाद उन्होंने विश्व हिंदू परिषद, भारत विकास परिषद, भारतीय मजदूर संघ और कई राष्ट्रवादी संगठनों के साथ सक्रिय रूप से कार्य किया। 1974 में उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी शुरू की, लेकिन भाजपा और वैचारिक राजनीति से उनका जुड़ाव लगातार बना रहा।
सुषमा स्वराज की सीट से जीता पहला चुनाव
1990 में जब भाजपा की वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सुषमा स्वराज राज्यसभा सदस्य चुनी गईं तो अंबाला छावनी विधानसभा सीट रिक्त हो गई। अनिल विज ने बैंक की नौकरी से इस्तीफा देकर उपचुनाव लड़ने का फैसला किया। 27 मई 1990 को हुए उपचुनाव में मात्र 37 वर्ष की आयु में वे पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। उस समय हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री थे। बैंक की सुरक्षित नौकरी छोड़कर राजनीति में आए विज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आगे चलकर अंबाला छावनी की राजनीति का पर्याय बन गए।
अपनी पार्टी बनाई, लेकिन नहीं छोड़ी विचारधारा
राजनीतिक परिस्थितियों के चलते अनिल विज ने कुछ समय के लिए भाजपा से दूरी बनाई। 1996 और 2000 के विधानसभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते। भाजपा और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति उनका लगाव कभी समाप्त नहीं हुआ। 2009 में भाजपा नेतृत्व ने पुनः उन पर विश्वास जताया और टिकट दिया। इसके बाद उन्होंने 2009, 2014, 2019 और 2024 में लगातार चार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता को सिद्ध किया। आज वे अंबाला छावनी से सात बार विधायक चुने जा चुके हैं।
मंत्री पद के लिए कभी नहीं बदली विचारधारा
अनिल विज के राजनीतिक जीवन का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि उन्होंने सत्ता के लिए कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन विज ने उसे अस्वीकार कर दिया। वर्ष 2000 में ओमप्रकाश चौटाला सरकार के दौरान भी उन्हें इनेलो में शामिल होकर मंत्री बनने का प्रस्ताव मिला। पार्टी के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश महाजन दो दिन तक उन्हें मनाने का प्रयास करते रहे, लेकिन विज अपने सिद्धांतों से नहीं डिगे। हरियाणा की राजनीति में ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं।
साधारण परिवार से निकलकर बने जनप्रिय नेता
राजनीति से कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि न रखने वाले एक साधारण परिवार में जन्मे अनिल विज ने अपने दम पर राजनीति में पहचान बनाई। लोगों की मदद करना, दुख-दर्द में साथ खड़ा होना और जनता से सीधा संवाद उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। बैंक कर्मचारी रहते हुए भी वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते थे और विधायक बनने के बाद भी उन्होंने इस स्वभाव को नहीं बदला। यही कारण है कि आज भी उनके दरवाजे आम जनता के लिए खुले रहते हैं।
टेक्नोलॉजी के प्रयोग में सबसे आगे
अनिल विज को हरियाणा की राजनीति का सबसे तकनीक-प्रेमी नेता भी माना जाता है। जब अधिकांश विधायक तकनीक से दूर थे, तब विज ने विधानसभा में मिले पहले लैपटॉप का उपयोग करते हुए "इंडिया नेट" नामक एक पोर्टल शुरू किया था। आज भी वे सोशल मीडिया के लगभग सभी प्लेटफॉर्म स्वयं संचालित करते हैं। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), व्हाट्सएप और ई-मेल के माध्यम से वे सीधे जनता और मीडिया से संवाद करते हैं। कोरोना संक्रमण के दौरान अस्पताल में भर्ती रहते हुए भी उन्होंने अपने विभागों की निगरानी तकनीक के माध्यम से जारी रखी थी।
क्यों कहलाते हैं 'सिंगल मैन आर्मी'?
अनिल विज को "सिंगल मैन आर्मी" कहे जाने के पीछे केवल उनकी राजनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि उनका कार्य करने का अनूठा तरीका भी है। विधायक बनने के बाद से लेकर मंत्री बनने तक उन्होंने अपने प्रेस नोट स्वयं लिखे। फैक्स का दौर हो, ई-मेल का समय हो या फिर व्हाट्सएप का युग—विज अपने समाचार और प्रतिक्रियाएं खुद तैयार कर मीडिया तक पहुंचाते रहे। विधानसभा प्रश्नों से लेकर जनहित के मुद्दों तक, उन्होंने शायद ही कभी किसी सहायक या टीम पर निर्भरता दिखाई हो। आज भी जब कोई समसामयिक विषय उन्हें महत्वपूर्ण लगता है तो वे स्वयं प्रेस नोट लिखकर मीडिया को भेजते हैं।
प्रशंसा या आलोचना से परे
अनिल विज का एक कथन उनकी कार्यशैली को पूरी तरह परिभाषित करता है— "मैं किसी की प्रशंसा का मोहताज नहीं हूं। मैं एक कार्यकर्ता हूं और अपना काम करता हूं। कोई मेरे काम की सराहना करे, विरोध करे या उससे जले, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।" शायद यही कारण है कि पांच दशक की राजनीति के बाद भी अनिल विज आज भी एक ऐसे नेता के रूप में पहचाने जाते हैं जो अपनी स्पष्टवादिता, संगठन के प्रति निष्ठा, तकनीकी दक्षता और जनसेवा के कारण अलग पहचान रखते हैं। हरियाणा की राजनीति में अनेक नेता आए और गए, लेकिन अनिल विज का राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि विचारधारा, संघर्ष और जनसंपर्क के बल पर भी लंबी और प्रभावशाली राजनीतिक पारी खेली जा सकती है।