अमरीका से समझौता करके मोदी सरकार ने भारत के किसानों व खेत-खलिहानों के हितों की दी बलि : रणदीप सुर्जेवाला
punjabkesari.in Monday, Feb 16, 2026 - 08:38 PM (IST)
नई दिल्ली (संजय अरोड़ा): अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय महासचिव, कर्नाटक के प्रभारी एवं राज्यसभा के सदस्य रणदीप सिंह सुर्जेवाला का कहना है कि अमरीका के साथ मोदी सरकार द्वारा की गई डील पूरी तरह से किसान विरोधी है। ‘‘देशहित’’ ‘‘गिरवी’’ रख व्यापार समझौता ‘‘मंजूर नहीं’’ हो सकता। खेत-खलिहान-किसान की रोजी-रोटी पर हमला, भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़, भारत की संप्रभुता व आत्मनिर्भरता से समझौता मंजूर नहीं किया जा सकता है।
सोमवार को नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रणदीप सुर्जेवाला ने कहा कि वे मानते हैं कि व्यापार समझौते आर्थिक तरक्की का रास्ता होते हैं। व्यापार समझौतों का आधार ही बराबरी की शर्तों पर परस्पर लोकहित है। व्यापार समझौते की आड़ में देशहित ओर लोकहित की बलि नहीं दी जा सकती और भारत के 144 करोड़ जनमानस इसे स्वीकार नहीं करेंगे। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि अमरीका-भारत व्यापार समझौते में मोदी सरकार ने भारत के किसानों व खेत-खलिहान के हितों की बलि दे डाली है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा से सरेआम खिलवाड़ किया गया है। भारत की डिजिटल स्वायत्ता व हमारी डेटा प्राईवेसी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। भारतीय हितों की रक्षा में मजबूती से खड़े होने की बजाय, एक मजबूर सरकार ने भारत की संप्रभुता व आत्मनिर्भरता से समझौता कर लिया। लोग पूछ रहे हैं - ‘‘मजबूत सरकार’’ या ‘‘मजबूर सरकार’’! ‘आत्मनिर्भर’ भारत या ‘अमरीका-निर्भर’ भारत ।
राज्यसभा सदस्य ने केंद्र सरकार पर लगाई सवालों की झड़ी
राज्यसभा के सदस्य रणदीप सिंह सुर्जेवाला ने अमरीका के साथ की गई ट्रेड डील को लेकर केंद्र सरकार पर सवालिया निशान लगाते हुए इसे खेत-खलिहान-किसान से विश्वासघात बताया। उन्होंने कहा कि यह डील भारत के कृषि बाजार में अमरीका के खेती व खाद्य उत्पादों का आयात किसान की रोजी-रोटी पर सीधा हमला है। अमरीका-भारत व्यापार समझौते के 6 फरवरी, 2026 के ‘फ्रेमवर्क एग्रीमैंट’ के पहले बिंदु में ही सहमति जताई है कि भारत बगैर किसी आयात शुल्क के अमरीका के खाद्य व कृषि उत्पादों के लिए हमारा बाजार खोल देगा। सबसे पहली चर्चा ‘‘ड्राईड डिस्टिलर ग्रेन’’ के भारत में आयात की है। यह असल में प्रोसेस्ड मक्का है।
भारत में 4.30 करोड़ मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन 2025-26 में हुआ। भारत में मक्का कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, गुजरात में पैदा होता है। इसके विपरीत, अमरीका 42.50 करोड़ मीट्रिक टन मक्का पैदा करता है और उसे इसे बेचने के लिए भारत जैसा बड़ा बाजार चाहिए। अगर अमेरिका से ड्यूटी-फ्री (शुल्क रहित) मक्के के लिए भारत का बाजार खुल जाएगा, तो देश के किसानों का क्या होगा? व्यापार समझौते में इसके बाद अमरीका से ‘ज्वार’ के आयात को खोलने बारे सहमति जताई है। भारत का ज्वार उत्पादन इस साल 52 लाख मीट्रिक टन है। भारत में ज्वार उत्पादन करने वाले सबसे बड़े प्रांत महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व गुजरात हैं।
इसके विपरीत अमरीका 87 लाख मीट्रिक टन सालाना ज्वार उत्पादन करता है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। अगर अमेरिका का ड्यूटी-फ्री (शुल्क रहित) ज्वार भारत के बाजार में बिकेगा, तो फिर भारत के किसान का क्या होगा? कांग्रेस महासचिव रणदीप सुर्जेवाला ने कहा कि व्यापार समझौते में अमेरिका से ‘सोयाबीन ऑयल’ के आयात को खोलने बारे सहमति जताई गई है। भारत का सालाना सोयाबीन उत्पादन 153 लाख टन (साल 2024-25) है। भारत में सोयाबीन की पैदावार मुख्यत: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व कर्नाटक में होती है। इसके विपरीत, अमरीका में 12 करोड़ मीट्रिक टन सालाना सोयाबीन का उत्पादन होता है। क्या अमरीका से ड्यूटी-फ्री (जीरो शुल्क पर) सोयाबीन आयात से भारत के साधारण किसान की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा?
व्यापार समझौते का सबसे बड़ा प्रभाव कपास उत्पादकों पर पड़ेगा
रणदीप सुर्जेवाला ने कहा कि व्यापार समझौते का बड़ा प्रभाव ‘‘कपास’’ पैदा करने वाले किसान पर पड़ेगा। 9 फरवरी, 2026 को अमरीका ने पड़ौसी देश, बांग्लादेश से व्यापार समझौता किया, जिसमें स्पष्ट तौर से कहा गया कि बांग्लादेश अमरीकी कपास व धागा आयात कर जो कपड़ा व वस्त्र अमरीका को निर्यात करेगा, उस पर अमरीका में जीरो शुल्क लगेगा। इसके विपरीत भारत जो कपड़ा व वस्त्र का बड़ा निर्यातक है, हमारे निर्यात पर 18 प्रतिशत शुल्क लगेगा। इससे तिरुपुर, सूरत, पानीपत, लुधियाना व पूरे देश के वस्त्र उद्योग पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
सुर्जेवाला ने कहा कि इसी साल 12 फरवरी को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सार्वजनिक तौर से देश को बताया कि भारत भी अमरीका से कपास आयात कर जो कपड़ा व वस्त्र निर्यात करेगा, उसे भी बांग्लादेश के बराबर राहत मिलेगी। यानी अब अमरीकी कपास के भारत में नि:शुल्क आयात का दरवाजा भी मोदी सरकार ने खोल दिया है। दूसरी ओर बांग्लादेश भारत से 50 प्रतिशत कपास का आयात करता है। अब कपास का भारत से बांग्लादेश को निर्यात भी बंद हो जाएगा। यह किसान पर दोहरी मार है।
मोदी सरकार ने पहले ही अमरीका से भारत में कपास का आयात शुरू कर दिया है। साल 2024-25 में भारत ने अमरिका से 378 मिलियन अमरीकी डॉलर की कपास का आयात किया। इसके चलते ही भारत में कपास की कीमत एम.एस.पी. से 1 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक नीचे गिर गई। अब अमरीकी कपास का आयात होगा, तो देश, विशेषत: महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के कपास पैदा करने वाले किसान का क्या होगा? दूसरी ओर भारत से बांग्लादेश को सालाना 2.7 बिलियन अमरीकी डॉलर कपास व धागे का निर्यात किया जाता है।
ऐसे में यह बड़ा प्रश्र है कि जब बांग्लादेश अमरीका से कपास व धागा मंगवाएगा, तो भारत के कपास उत्पादक किसान व कपड़ा बनाने वाले कारखानों का क्या होगा? व्यापार समझौते के पहले बिंदु में अमरीका से आयात किए जाने वाले खाद्य व कृषि उत्पादों में ‘‘एडिशनल प्रोडक्ट्स’’ (अतिरिक्त उत्पाद) लिखा है। ये अतिरिक्त उत्पाद कौन सा अनाज है? क्या मोदी सरकार बताएगी कि पिछले दरवाजे से अमरीकी अनाज आयात करने के और क्या-क्या समझौते किए गए हैं? ऐसे ही अमरिका से जेनेटिकली मोडिफाईड कृषि उत्पादों के आयात की अनुमति भारत के किसान के लिए घातक है। भारत अमरीका व अन्य देशों से जी.एम. कृषि उत्पाद आयात करने की अनुमति नहीं देता क्योंकि इससे भारत की ओरिजनल बीज शुद्धता व बीज प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी।
अगर भारत में प्रोसेस्ड मक्का, ज्वार, सोयाबीन व अन्य कृषि उत्पाद आएंगे, तो क्या उनका सीधा प्रतिकूल प्रभाव भारत की जैविक विविधता पर नहीं पड़ेगा? क्या मोदी सरकार ने पिछले दरवाजे से भारत में जी.एम. क्रॉप्स के आयात न करने की नीति को छूट दे दी है? क्या भारत की जैविक विविधता व शुद्धता पर पडऩे वाले प्रतिकूल तथा दूरगामी प्रभावों का आंकलन किया गया है?
कांग्रेस महासचिव का आरोप, किसान वर्ग पर वज्रपात साबित होगी डील
कांग्रेस महासचिव रणदीप सुर्जेवाला ने बताया कि व्यापार समझौते के पांचवें बिंदु में साफ लिखा है कि अमरीका की चिंताओं के अनुरूप भारत अपने नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर हटाने की ओर बढ़ेगा। अमरिका अपने किसान को सालाना (साल 2025) अमेरिकी डॉलर 16 बिलियन की सब्सिडी देता है। इसके विपरीत, भारत के किसान से 6,000 प्रति सब्सिडी देकर महंगे डीजल-खाद-बिजली-कीटनाशक दवाईयों के माध्यम से 25,000 प्रति हैक्टेयर तक वापस ले ली जाती है। इसके बावजूद भी व्यापार समझौते में बची-खुची किसान को मिलने वाली रियायत वापस लेने का फैसला पूरे किसान वर्ग के लिए वज्रपात साबित होगा।
6 फरवरी के व्यापार समझौते के बाद ही अमरीका के राष्ट्रपति ने भारत पर लगे 25 प्रतिशत पैनल्टी टैरिफ आदेश में लिखा कि भारत ने अमरीका से वादा किया है कि वह अब रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा। चौंकाने वाली बात यह है कि उसी आदेश के सैक्शन 4 में अमरीका के राष्ट्रपति ने लिखा कि वह भारत की निगरानी करेगा और अगर भारत ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रूस से कच्चा तेल खरीदा तो फिर भारत पर पैनल्टी दोबारा लगा देगा। ऐसे ही 9 फरवरी को अमरीका के राष्ट्रपति द्वारा जारी फैक्ट शीट में भी भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल न खरीदने का वादा करने बारे शर्त दोहराई। अब 14 फरवरी को ‘म्यूनिख सिक्योरिटी कांफ्रैंस’ में अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कहा था कि भारत ने रूस से कच्चा तेल न खरीदने का सशर्त वादा अमरीका से किया है। अमरीका पहले ही मई, 2024 में पाबंदी लगा चुका है कि भारत ईरान से भी कच्चा तेल नहीं खरीद सकता, जिसे मोदी सरकार ने स्वीकार कर लिया है। ज्ञात रहे कि ईरान भारत को भारतीय रुपए में कच्चा तेल बेचता था।
भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है, जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा है। भारत 40 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से व 11 प्रतिशत कच्चा तेल ईरान से आयात करता आया है, यानी अपनी कुल जरूरत का लगभग 51 प्रतिशत। फरवरी, 2022 से जनवरी, 2026 के बीच भारत ने रूस से 168 बिलियन अमरीकी डॉलर का कच्चा तेल आयात किया और सस्ती दरों के चलते लगभग 20 बिलियन अमरीकी डॉलर की बचत हुई। अब भारत को व्यापार समझौते के तहत अमरिका से कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा, जिसमें रूस और ईरान के बराबर कम कीमतों का कोई आश्वासन नहीं है। क्या यह सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से समझौता नहीं? व्यापार समझौते में भारत पर अमरीका से 5 साल में 500 बिलियन डॉलर का सामान खरीदने की पाबंदी क्या देशहित के अनुरूप है? साल 2024 में भारत ने अमरीका को 81 बिलियन अमरीकी डॉलर का सामान निर्यात किया और 43 बिलियन अमरीकी डॉलर का सामान आयात किया।
यानी, अमरीका से भारत का ट्रेड सरप्लस 38 बिलियन डॉलर है। 13 फरवरी, 2025 को जब प्रधानमंत्री मोदी अमरीका गए और साझा बयान जारी हुआ, तो उसके पैराग्राफ 7 में यह कहा गया था कि दोनों देश अपना ‘‘परस्पर व्यापार’’ 500 बिलियन डॉलर तक बढ़ाएंगे। अब 6 फरवरी 2026 के व्यापार समझौते में इसे पूरी तरह से दरकिनार कर दिया और कहा गया कि भारत अगले 5 साल तक हर साल 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का अमरिकी सामान खरीदेगा। यानी 5 साल में 45 लाख करोड़ रुपए। सवाल यह है कि व्यापार समझौता बराबरी के आधार पर है या जबरदस्ती के आधार पर? तो फिर मोदी सरकार इसे क्यों मान रही है? ऐसे में पूरा देश जवाब मांगता है।
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