सिर्फ 10% दिव्यांगता प्रमाणपत्र से नहीं बढ़ेगा मुआवजा, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने साफ किया नियम
punjabkesari.in Thursday, Aug 13, 2026 - 08:19 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल 10 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र भविष्य की कमाई में नुकसान के मुआवजे का आधार नहीं बन सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि दिव्यांगता स्थायी है और उससे व्यक्ति की काम करने तथा भविष्य में कमाई करने की क्षमता प्रभावित हुई है।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने दिव्यांगता के आधार पर मुआवजा बढ़ाने की मांग वाली अपील खारिज करते हुए कहा कि शारीरिक दिव्यांगता और कमाई की क्षमता में होने वाला नुकसान एक ही चीज नहीं है। किसी व्यक्ति की शारीरिक दिव्यांगता का प्रतिशत उसकी आय अर्जित करने की क्षमता में नुकसान के प्रतिशत के बराबर नहीं माना जा सकता।
दुर्घटना में दाहिने घुटने के नीचे लगी थी चोट
मामले में अपीलकर्ता एक दुर्घटना में घायल हुआ था। उसके दाहिने घुटने के ठीक नीचे चोट लगी थी, जिसके बाद उसे हल्की जकड़न की समस्या हुई। मेडिकल प्रमाणपत्र में उसकी दिव्यांगता 10 प्रतिशत बताई गई थी। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण को भविष्य में उसकी कमाई की क्षमता प्रभावित होने के लिए भी मुआवजा देना चाहिए था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि 10 प्रतिशत दिव्यांगता स्थायी थी या इसके कारण अपीलकर्ता अपने पहले किए जा रहे काम को करने में असमर्थ हो गया था।
शारीरिक दिव्यांगता और कार्यात्मक दिव्यांगता अलग
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थायी दिव्यांगता के मामलों में भी भविष्य की आय में नुकसान का आकलन केवल शारीरिक दिव्यांगता के प्रतिशत को आय पर लागू करके नहीं किया जा सकता। अदालत को यह देखना होगा कि चोट और दिव्यांगता ने संबंधित व्यक्ति की वास्तविक कार्यक्षमता तथा कमाई की क्षमता को कितना प्रभावित किया है।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के शरीर के एक हिस्से में दिव्यांगता होने के बावजूद जरूरी नहीं कि उसकी आजीविका कमाने की क्षमता उसी अनुपात में प्रभावित हो। इसलिए मुआवजे का निर्धारण वास्तविक कार्यात्मक प्रभाव और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
स्थायी दिव्यांगता का प्रमाण नहीं मिला
हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता की दाहिने घुटने के नीचे की चोट के कारण 10 प्रतिशत दिव्यांगता आंकी गई थी, लेकिन इस दिव्यांगता के स्थायी होने का कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया। साथ ही ऐसा कोई साक्ष्य भी सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि घुटने की जकड़न के कारण वह दुर्घटना से पहले किए जा रहे कार्य को करने में असमर्थ हो गया या उसकी भविष्य की आय प्रभावित हुई।
अधिकरण ने दिव्यांगता को नजरअंदाज नहीं किया
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने अपीलकर्ता की चोट और दिव्यांगता को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया था। अधिकरण ने चोट और अस्थायी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए पहले ही 18 हजार रुपये का मुआवजा प्रदान किया था।
अपीलकर्ता ऐसा कोई अतिरिक्त साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसे अधिकरण ने नजरअंदाज किया हो या गलत तरीके से समझा हो और जिससे स्थायी कार्यात्मक दिव्यांगता अथवा कमाई की क्षमता में वास्तविक नुकसान साबित होता।
हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों में मुआवजा बढ़ाने की मांग को खारिज कर दिया।
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