PGI चंडीगढ़ में 1,000 से ज्यादा मरीज इंतजार में, देश में बढ़ा कॉर्निया कलेक्शन...फिर भी ट्रांसप्लांट के लिए लंबी कतार

punjabkesari.in Sunday, Aug 30, 2026 - 02:05 PM (IST)

चंडीगढ़(चंद्र शेखर धरणी ): जिंदगी में आंखें हमें दुनिया देखने का मौका देती हैं, लेकिन जिंदगी खत्म होने के बाद भी यही आंखें किसी दूसरे इंसान की दुनिया रोशन कर सकती हैं। नेत्रदान की यही सबसे बड़ी खूबसूरती और मानवीय ताकत है। एक व्यक्ति के निधन के बाद उसकी आंखें किसी ऐसे व्यक्ति के लिए उम्मीद बन सकती हैं, जो लंबे समय से रोशनी का इंतजार कर रहा है। देश में नेत्रदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है और कॉर्निया कलेक्शन के आंकड़े भी हर साल ऊपर जा रहे हैं। इसके बावजूद दृष्टिहीनता से जूझ रहे लोगों की जरूरत और उपलब्ध कॉर्निया के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।

देश में करीब 11 लाख लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से प्रभावित हैं। इसके मुकाबले हर साल लगभग 25 से 30 हजार कॉर्निया ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। चंडीगढ़ स्थित पीजीआई की स्थिति इस चुनौती की गंभीरता को और स्पष्ट करती है। संस्थान में 1,000 से ज्यादा मरीज कॉर्निया ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि सालाना करीब 400 से 500 डोनेटेड कॉर्निया ही उपलब्ध हो पाती हैं। ऐसे में नेत्रदान केवल जागरूकता का विषय नहीं, बल्कि हजारों लोगों के लिए जीवन की गुणवत्ता और भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है।


25 अगस्त से 8 सितंबर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा
नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने और लोगों को मृत्यु के बाद आंखें दान करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से 25 अगस्त से 8 सितंबर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इस दौरान देशभर में विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। चिकित्सकों, स्वास्थ्य विभागों, आई बैंकों और सामाजिक संस्थाओं की ओर से लोगों को नेत्रदान की प्रक्रिया, इसके महत्व और इससे जुड़े भ्रमों के बारे में जानकारी दी जा रही है।

इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ लोगों से नेत्रदान का संकल्प लेने की अपील करना नहीं है, बल्कि परिवारों को यह समझाना भी है कि मृत्यु के बाद समय पर आई बैंक या संबंधित स्वास्थ्य संस्थान को सूचना देना बेहद महत्वपूर्ण है। कई मामलों में परिवार इच्छा तो जताता है, लेकिन प्रक्रिया की जानकारी नहीं होने या सूचना देने में देरी के कारण संभावित नेत्रदान नहीं हो पाता।

तीन साल में कॉर्निया कलेक्शन लगातार बढ़ा
राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि नेत्रदान को लेकर लोगों में जागरूकता का दायरा बढ़ रहा है। वर्ष 2022-23 में देश में 62,370 कॉर्निया कलेक्शन हुए थे। वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 66,434 हो गया। वहीं 2024-25 में देशभर में 69,848 कॉर्निया कलेक्शन दर्ज किए गए।
देश में वर्तमान में करीब 396 आई बैंक काम कर रहे हैं। आई बैंक नेत्रदान के बाद आंखों को सुरक्षित रखने और जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। हालांकि कॉर्निया कलेक्शन का आंकड़ा बढ़ना अपने आप में ट्रांसप्लांट की जरूरत पूरी होने की गारंटी नहीं है।

हर डोनेटेड कॉर्निया ट्रांसप्लांट के योग्य नहीं
नेत्रदान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि दान की गई प्रत्येक कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं होती। विभिन्न चिकित्सकीय कारणों से कुछ कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लिए इस्तेमाल नहीं हो पातीं। इसलिए कलेक्शन की संख्या और सफल ट्रांसप्लांट की संख्या में अंतर रहता है।
यही कारण है कि देश में कॉर्निया कलेक्शन लगातार बढ़ने के बावजूद जरूरतमंद मरीजों की प्रतीक्षा सूची खत्म नहीं हो पा रही है। विशेषज्ञों के सामने चुनौती अब सिर्फ लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने की नहीं, बल्कि अधिक से अधिक उपयुक्त कॉर्निया उपलब्ध कराने की भी है।

पीजीआई में हर दिन बढ़ रही इंतजार की कतार
चंडीगढ़ स्थित पीजीआई में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा कर रहे 1,000 से अधिक मरीज इस समस्या का स्थानीय चेहरा हैं। संस्थान में सालभर में लगभग 400 से 500 डोनेटेड कॉर्निया उपलब्ध हो पाती हैं। इसके मुकाबले मरीजों की संख्या काफी अधिक है।

प्रतीक्षा सूची में शामिल हर मरीज की अपनी अलग कहानी है। किसी के लिए आंखों की रोशनी वापस मिलना पढ़ाई और करियर की ओर लौटने का रास्ता है, तो किसी के लिए यह अपने परिवार को सामान्य रूप से देखने और रोजमर्रा के काम खुद करने की उम्मीद है। ऐसे में प्रत्येक सफल नेत्रदान किसी व्यक्ति के लिए केवल चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को नए सिरे से देखने का अवसर बन सकता है। पीजीआई की स्थिति यह भी बताती है कि नेत्रदान के प्रति जागरूकता को अस्पतालों और आई बैंकों तक पहुंचने वाली समयबद्ध सूचना से जोड़ना कितना जरूरी है।

हरियाणा में एक साल में 644 ज्यादा आई-बॉल कलेक्शन
हरियाणा में नेत्रदान के आंकड़े उत्साह बढ़ाने वाले हैं। प्रदेश में वर्ष 2024-25 में 1,624 आई-बॉल कलेक्शन हुए थे। वर्ष 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 2,268 हो गई। यानी एक साल में 644 अधिक आई-बॉल कलेक्शन हुए, जो करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।
जिलावार आंकड़ों में करनाल सबसे आगे रहा। वर्ष 2025-26 में यहां 916 आई-बॉल कलेक्शन दर्ज किए गए। इसके बाद गुरुग्राम में 291 और सिरसा में 146 कलेक्शन हुए।

सबसे बड़ा बदलाव सोनीपत में देखने को मिला। वर्ष 2024-25 में यहां केवल 6 आई-बॉल कलेक्शन हुए थे, लेकिन 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 375 हो गई। यह वृद्धि बताती है कि स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान और संस्थागत प्रयासों से नेत्रदान की तस्वीर कितनी तेजी से बदल सकती है।

हालांकि हर जिले में वृद्धि नहीं हुई। फरीदाबाद में कलेक्शन 150 से घटकर 133 और रोहतक में 220 से घटकर 114 रह गए। इससे साफ है कि प्रदेश में नेत्रदान का अभियान गति तो पकड़ रहा है, लेकिन इसकी पहुंच और प्रभाव सभी जिलों में समान नहीं है।

एक व्यक्ति का नेत्रदान दो लोगों के लिए बन सकता है उम्मीद
नेत्रदान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक व्यक्ति का दान दो दृष्टिबाधित लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो दृष्टिबाधित लोगों को लाभ मिल सकता है।

इस लिहाज से एक परिवार का लिया गया फैसला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह दो परिवारों की जिंदगी बदलने की क्षमता रखता है। राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े में इसी संदेश को प्रमुखता से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

फिर भी समाज के एक हिस्से में नेत्रदान को लेकर कई तरह के भ्रम मौजूद हैं। कुछ लोग उम्र को लेकर सवाल करते हैं, कुछ मृत्यु के बाद शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित रहते हैं, जबकि कई परिवारों को यह जानकारी ही नहीं होती कि मृत्यु के बाद किससे और कितनी जल्दी संपर्क किया जाना चाहिए।

जागरूकता के साथ परिवारों को प्रक्रिया की जानकारी देना जरूरी
नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए केवल पोस्टर, भाषण और अपील पर्याप्त नहीं हैं। परिवारों को पूरी प्रक्रिया की जानकारी देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासतौर पर यह बताना जरूरी है कि मृत्यु के बाद संबंधित आई बैंक या स्वास्थ्य संस्थान को समय पर सूचना कैसे दी जाए और नेत्रदान की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी होती है।

कई बार व्यक्ति जीवनकाल में नेत्रदान की इच्छा व्यक्त कर चुका होता है, लेकिन परिवार को उसकी इच्छा या प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती। ऐसे मामलों में मृत्यु के बाद समय निकल जाने से संभावित दान संभव नहीं हो पाता। इसलिए परिवार के सदस्यों के बीच पहले से इस विषय पर बातचीत और इच्छा की जानकारी साझा करना अभियान को प्रभावी बना सकता है।
 


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Content Writer

Isha

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