डिजिटल भुगतान पर नया विवाद: यूपीआई पर 0.4% शुल्क के फैसले से भड़के रणदीप सुरजेवाला, सरकार से मांगे जवाब
punjabkesari.in Friday, Sep 18, 2026 - 09:10 PM (IST)
नई दिल्ली (संजय अरोड़ा): कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद रणदीप सुर्जेवाला ने 2 हजार रुपए से अधिक के चुनिंदा यू.पी.आई व्यापारी लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चंेट डिस्काउंट रेट यानी व्यापारी भुगतान शुल्क लागू किए जाने के फैसले पर केंद्र सरकार की नीति को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि जिस यू.पी.आई को देश के हर नागरिक के लिए सरल, सस्ता और डिजिटल भुगतान का माध्यम बनाकर पेश किया गया था अब उसी व्यवस्था की लागत का बोझ व्यापारियों पर डालने का फैसला क्यों किया गया है? यह सवाल केवल 0.4 प्रतिशत शुल्क का नहीं है बल्कि सवाल ये है कि मुफ्त डिजिटल भुगतान की व्यवस्था को आखिर किस दिशा में ले जाया जा रहा है?
सुर्जेवाला ने कहा कि 15 अक्तूबर 2026 से लागू होने वाली नई व्यवस्था के तहत 2 हजार रुपए से अधिक के चुनिंदा पी2एम यानी व्यक्ति से व्यापारी तक यू.पी.आई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत व्यापारी भुगतान शुल्क लगेगा। वहीं पी2पी यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किया जाने वाला भुगतान और 2,000 रुपए तक के पी2एम भुगतान शुल्क मुक्त रहेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार कह रही है कि ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेकिन देश का व्यापारी पूछ रहा है कि जब उसकी जेब से भुगतान व्यवस्था की लागत निकलेगी तो उस अतिरिक्त लागत का अंतिम असर बाजार पर कैसे नहीं पड़ेगा?
छोटे-बड़े हर कारोबार तक यू.पी.आई. के माध्यम से होता है भुगतान
राज्यसभा सदस्य रणदीप सुर्जेवाला ने कहा कि देश में करोड़ों छोटे दुकानदार, व्यापारी, सेवा प्रदाता और कारोबारी यू.पी.आई पर निर्भर हैं। आज सब्जी से लेकर कपड़े, दवा, इक्लैट्रॉनिक्स, शिक्षा, यात्रा और छोटे-बड़े कारोबार तक डिजिटल भुगतान का महत्वपूर्ण हिस्सा यू.पी.आई के माध्यम से होता है। ऐसे में व्यापारी की लागत में होने वाला कोई भी बदलाव केवल बैंकिंग व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसका असर कारोबार के लाभांश, कीमतों और बाजार के व्यवहार पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का सवाल सीधा है कि जब सरकार ने वर्षों तक यू.पी.आई को डिजिटल भारत की सफलता का प्रतीक बताया तो अब उसी व्यवस्था के लिए व्यापारियों से शुल्क लेने की जरूरत क्यों पड़ी? सुर्जेवाला ने कहा कि सरकार इसे व्यापारी भुगतान शुल्क कह रही है लेकिन आम व्यापारी के लिए नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसकी लागत कितनी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि नए शुल्क से सालाना कितनी राशि एकत्र होगी उसका वितरण किन संस्थाओं के बीच होगा और इस पूरी राशि का उपयोग किस मद में किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर यू.पी.आई के संचालन साइबर सुरक्षा और तकनीकी ढांचे की लागत बढ़ी है तो सरकार देश को पूरा हिसाब दे।
कितना खर्च हो रहा है? किस संस्था का कितना खर्च है? भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम की वित्तीय स्थिति क्या है? बैंकों और भुगतान कंपनियों को कितना हिस्सा मिलेगा? और व्यापारी से लिया गया पैसा डिजिटल भुगतान के ढांचे को मजबूत करने में कितना लगेगा? सुर्जेवाला ने यह भी कहा कि सरकार को छोटे व्यापारियों की स्थिति को ध्यान में रखना होगा। बड़े औद्योगिक घराने और बड़े ऑनलाइन व्यापार मंच अतिरिक्त लागत को अलग तरीके से संभाल सकते हैं, लेकिन छोटे दुकानदार के लिए प्रत्येक लेनदेन पर लगने वाली लागत महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए सरकार केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती कि शुल्क सीधे ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत के छोटे दुकानदार पहले ही महंगाई, बढ़ती लागत, किराए, बिजली, कर्मचारियों के वेतन और बाजार की प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ाना छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
यू.पी.आई. ने भारत में भुगतान करने का तरीका बदला
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सुर्जेवाला ने सरकार से यह भी पूछा कि जब यू.पी.आई को देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताया जा रहा है तो उसकी लागत को केवल शुल्क के जरिए पूरा करने की नीति क्यों अपनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा केवल कमाई का माध्यम नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे देश के नागरिकों और कारोबारियों के लिए सुलभ बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि यू.पी.आई ने भारत में भुगतान करने का तरीका बदल दिया है। गांव का दुकानदार हो या शहर का कारोबारी, मजदूर हो या विद्यार्थी हर वर्ग ने इसे अपनाया है। इसलिए यू.पी.आई से जुड़ा कोई भी बड़ा नीतिगत बदलाव केवल वित्तीय निर्णय नहीं है, यह करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक जिंदगी से जुड़ा फैसला है। सुर्जेवाला ने केंद्र सरकार से मांग की कि 15 अक्तूबर से लागू होने वाले व्यापारी भुगतान शुल्क ढांचे की समीक्षा की जाए, छोटे व्यापारियों को पूर्ण सुरक्षा दी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी रूप में शुल्क का बोझ उपभोक्ता पर स्थानांतरित न हो।
उन्होंने कहा कि सरकार को यह भी लिखित और स्पष्ट आश्वासन देना चाहिए कि भविष्य में इस व्यवस्था का दायरा मनमाने ढंग से नहीं बढ़ाया जाएगा। आज 2,000 रुपए से ऊपर के चुनिंदा व्यक्ति से व्यापारी भुगतान हैं और कल व्यवस्था किस दिशा में जाएगी, इस पर पारदर्शिता जरूरी है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि यू.पी.आई भारत की तकनीकी क्षमता और डिजिटल परिवर्तन की बड़ी उपलब्धि है। हम यू.पी.आई के खिलाफ नहीं हैं। कांग्रेस डिजिटल भुगतान के विस्तार के खिलाफ नहीं है। हमारा सवाल है कि इस सार्वजनिक डिजिटल व्यवस्था को नागरिकों और छोटे व्यापारियों के हित में कैसे सुरक्षित रखा जाए। डिजिटल भारत का मतलब यह नहीं हो सकता कि सुविधा जनता की हो और लागत का बोझ बार-बार जनता और छोटे कारोबारियों पर डाला जाए। सुर्जेवाला ने कहा कि यू.पी.आई को मजबूत करना है तो पारदर्शिता बढ़ाइए, साइबर सुरक्षा मजबूत कीजिए, छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहन दीजिए और पूरा वित्तीय हिसाब देश के सामने रखिए। भारत की जनता को सुविधा चाहिए, शुल्क का नया जाल नहीं। सरकार को बताना होगा कि मुफ्त और सर्वसुलभ डिजिटल भुगतान की जिस व्यवस्था पर देश ने भरोसा किया, उसे अब किस दिशा में ले जाया जा रहा है।