बंधुआ मजदूरी के दौरान हाथ गंवाने वाले किशोर को मिला 10 लाख का मुआवजा, HHRC के हस्तक्षेप से मिला न्याय
punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 10:57 AM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : हरियाणा मानवाधिकार आयोग (HHRC) ने एक 15 वर्षीय बालक को महत्वपूर्ण राहत दिलाई है, जो गंभीर शोषण, बंधुआ मजदूरी और अमानवीय व्यवहार के कारण स्थायी विकलांगता का शिकार हो गया था।
आयोग ने इस मामले में समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लिया था। रिपोर्ट में बिहार के किशनगंज जिले के निवासी इस नाबालिग बालक की दयनीय स्थिति का उल्लेख किया गया था। बालक अपने साथियों से बहादुरगढ़ रेलवे स्टेशन पर बिछड़ गया था और कथित रूप से एक व्यक्ति द्वारा रोजगार का झूठा लालच देकर अपने साथ ले जाया गया। वैध रोजगार उपलब्ध कराने के बजाय उसे एक डेयरी फार्म में दो माह से अधिक समय तक बंधक बनाकर कठोर श्रम करने के लिए मजबूर किया गया।
इस अवधि के दौरान बालक से चारा काटने वाली मशीन चलाने सहित अनेक खतरनाक कार्य कराए गए। एक दुखद दुर्घटना में चारा काटते समय उसका बायां हाथ कोहनी के नीचे से कट गया। आरोप है कि तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के बजाय नियोक्ता ने घायल बालक को एक सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद बालक किसी तरह नूंह पहुंचा, जहां एक सतर्क शिक्षक ने उसके बचाव, उपचार तथा पुलिस हस्तक्षेप की व्यवस्था सुनिश्चित की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने पाया कि आरोपों से मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला बनता है, जिसमें बाल शोषण, बंधुआ मजदूरी, मानवीय गरिमा से वंचित करना तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 एवं 23 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन शामिल है। आयोग ने बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nations Convention on the Rights of the Child) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं का भी उल्लेख किया तथा जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, श्रम विभाग, चिकित्सा अधिकारियों एवं बाल संरक्षण एजेंसियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की।
आयोग के निर्देशों के अनुपालन में व्यापक जांच की गई। पुलिस थाना जी.आर.पी., बहादुरगढ़ में दिनांक 10.08.2025 को एफआईआर संख्या 18 दर्ज की गई। जांच पूर्ण होने के उपरांत आरोपित के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 तथा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। यह मामला वर्तमान में सक्षम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।
दिनांक 14.05.2026 को हुई सुनवाई के दौरान आयोग ने यह संज्ञान लिया कि पीड़ित बालक अपने बाएं हाथ के ऊपरी हिस्से को खोने के कारण स्थायी विकलांगता का शिकार हो गया है तथा उसे अत्यधिक शारीरिक और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है। आयोग ने यह भी कहा कि बालक के पुनर्वास हेतु कृत्रिम अंग उपलब्ध कराना तथा दीर्घकालिक सहयोग सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। चोट की गंभीरता, स्थायी विकलांगता तथा समग्र पुनर्वास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आयोग ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के अंतर्गत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पीड़ित को ₹10 लाख का मुआवजा प्रदान करने की अनुशंसा की।
आयोग की अनुशंसा पर कार्रवाई करते हुए हरियाणा सरकार ने 16.06.2026 को पीड़ित बालक के पक्ष में ₹10 लाख की मुआवजा राशि स्वीकृत कर दी। उल्लेखनीय है कि हरियाणा विक्टिम कम्पेंसेशन स्कीम, 2020 के तहत ऐसे मामलों में अधिकतम ₹2 लाख तक का मुआवजा निर्धारित है, किन्तु राज्य सरकार ने इस मामले को विशेष श्रेणी में रखते हुए योजना के प्रावधानों में शिथिलता प्रदान की तथा मानवीय आधार पर ₹10 लाख की बढ़ी हुई सहायता राशि स्वीकृत की।
आयोग ने अपराध का पर्दाफाश करने तथा पीड़ित का पता लगाने में जांच अधिकारी द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना की है। इस संबंध में पुलिस अधीक्षक सुश्री नितिका गहलौत, आईपीएस को प्रशंसा-पत्र जारी किया गया है, जबकि जांच अधिकारी इंस्पेक्टर सत्य प्रकाश को प्रशस्ति/पुरस्कार प्रदान करने का मामला सक्षम प्राधिकारी के विचाराधीन है।
यह मामला आयोग की मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता तथा हरियाणा सरकार की संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई का उत्कृष्ट उदाहरण है। समय पर मुआवजा स्वीकृत कर पीड़ित को राहत प्रदान की गई। यह प्रकरण कमजोर एवं असहाय बच्चों की सुरक्षा, बंधुआ मजदूरी एवं शोषण के विरुद्ध संघर्ष तथा मानवाधिकार उल्लंघनों के पीड़ितों को न्याय, पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन पुनर्निर्माण हेतु सार्थक सहायता सुनिश्चित करने की सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।