PMLA की सख्त शर्तों पर भारी पड़ा अनुच्छेद 21: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
punjabkesari.in Monday, Aug 17, 2026 - 07:16 PM (IST)
चंडीगढ़(धरणी): पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मनी लांड्रिंग के मामलों में लंबे समय से विचाराधीन कैदियों की जमानत को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई आरोपित लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है और मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी उसकी वजह से नहीं है, तो प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) की धारा 45 की कड़ी जमानत शर्तें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के आड़े नहीं आ सकतीं।
संवैधानिक अधिकार को कानून की ऊंची दीवार से नहीं रोका जा सकता
जस्टिस सुमित गोयल ने गुरुग्राम निवासी वरुण पुरी को नियमित जमानत देते हुए कहा कि किसी कानून के माध्यम से संवैधानिक उपचार के रास्ते में इतनी ऊंची दीवार नहीं खड़ी की जा सकती कि संविधान के तहत उपलब्ध अधिकार ही अप्रभावी हो जाएं। हालांकि, यदि कोई आरोपित पीएमएलए के अपराध के मेरिट के आधार पर नियमित जमानत मांगता है तो उसे धारा 45 में निर्धारित दोनों कसौटियों को पूरा करना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जमानत की मांग लंबे समय से चली आ रही विचाराधीन हिरासत और अनुच्छेद 21 में मिले जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर की जाती है, तो पीएमएलए की कठोर जमानत शर्तों का प्रभाव सीमित हो जाता है।
हर मामले के लिए तय नहीं होगी हिरासत की कोई निश्चित अवधि
हाई कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि ऐसा कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं किया जा सकता जिसके पूरा होते ही हर मामले में लंबी हिरासत को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मान लिया जाए। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल गणितीय सूत्र या केवल दिनों और महीनों की यांत्रिक गणना के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले में मुकदमे की प्रगति, देरी के कारण, आरोपित की भूमिका और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायिक विवेक से निर्णय लेना होगा।
सीआरपीसी और बीएनएसएस में दी गई राहत न्यूनतम वैधानिक सुरक्षा
कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 436-ए तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 479 में अधिकतम सजा की आधी या एक-तिहाई अवधि पूरी होने पर विचाराधीन कैदियों को मिलने वाली राहत न्यूनतम वैधानिक आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इससे कम अवधि की हिरासत में अनुच्छेद 21 के आधार पर जमानत का दावा स्वतः समाप्त हो जाता है।
एस्टेट कंपनी पर रकम के दुरुपयोग का आरोप
मामले में ईसीआईआर और अभियोजन शिकायत के अनुसार याचिकाकर्ता की रियल एस्टेट कंपनी ने विभिन्न आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाओं के नाम पर घर खरीदारों और वित्तीय संस्थानों से बड़ी रकम जुटाई थी। प्रवर्तन निदेशालय का आरोप था कि इस राशि का इस्तेमाल उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया गया, जिनके लिए रकम प्राप्त की गई थी।
रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता को 22 जुलाई 2025 को गिरफ्तार किया गया था। हाई कोर्ट के समक्ष सुनवाई के समय वह करीब एक वर्ष 22 दिन से न्यायिक हिरासत में था।
सुनवाई में देरी भी जमानत के आकलन का अहम आधार
हाई कोर्ट ने लंबी विचाराधीन हिरासत के मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल हिरासत की अवधि ही जमानत का आधार नहीं होगी। अदालत यह भी देखेगी कि मुकदमे की सुनवाई किस गति से आगे बढ़ रही है और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।
यदि मुकदमे में देरी अभियोजन या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी परिस्थितियों के कारण है और आरोपित ने जानबूझकर सुनवाई लंबित नहीं कराई है, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को गंभीरता से विचार में लेना होगा।
पीएमएलए में कड़ा कानून, लेकिन संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि
इस फैसले से हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी संतुलन रेखांकित किया है। मनी लांड्रिंग जैसे गंभीर आर्थिक अपराधों में पीएमएलए की कठोर जमानत व्यवस्था लागू रहेगी, लेकिन लंबे समय तक बिना मुकदमे के अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचे हिरासत में रखना अपने आप में संवैधानिक सवाल खड़ा कर सकता है।
अदालत ने साफ किया कि लंबी विचाराधीन हिरासत के मामलों में कोई सार्वभौमिक समय-सीमा या एक जैसा फार्मूला लागू नहीं किया जा सकता। हर मामले के तथ्यों, आरोपों की प्रकृति, मुकदमे की प्रगति, देरी के कारण और आरोपित की भूमिका का स्वतंत्र रूप से आकलन किया जाएगा।