आयुष्मान योजना फर्जी क्लेम मामला: हाईकोर्ट ने की विधाता नर्सिंग होम संचालक की जमानत याचिका खारिज, कहा– निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस हिरासत में पूछताछ जरूरी
punjabkesari.in Wednesday, Jul 29, 2026 - 08:36 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): आयुष्मान भारत योजना में कथित फर्जी क्लेम और जाली दस्तावेज तैयार करने के मामले में उकलाना स्थित विधाता नर्सिंग होम के संचालक डॉ. बिजेंद्र टाक को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष एवं प्रभावी जांच के लिए आरोपी से पुलिस हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंटरोगेशन) आवश्यक है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि अस्पताल में भर्ती नहीं रहे मरीजों के नाम पर कथित रूप से फर्जी बिल तैयार किए गए और उनका उपयोग आयुष्मान भारत योजना के पोर्टल पर क्लेम करने के लिए किया गया। न्यायालय ने माना कि पुलिस को यह भी जांचना होगा कि क्या इसी तरह की कार्यप्रणाली अपनाकर अन्य मामलों में भी योजना का दुरुपयोग किया गया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं। मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय करेगा।
जिला अदालत भी कर चुकी थी याचिका खारिज
इससे पहले हिसार की जिला एवं सत्र अदालत भी डॉ. बिजेंद्र टाक की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर चुकी थी। अदालत ने माना था कि मामले की जांच गंभीर प्रकृति की है और प्रभावी जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।
उल्लेखनीय है कि 22 मार्च 2026 को सीएम फ्लाइंग हिसार रेंज की इंचार्ज सुनैना के नेतृत्व में स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने उकलाना स्थित विधाता नर्सिंग होम पर छापेमारी की थी। टीम की शिकायत पर थाना उकलाना में डॉ. बिजेंद्र टाक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 336(3), 338 और 340 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
जांच में सामने आईं कई कथित अनियमितताएं
संयुक्त जांच के दौरान आयुष्मान भारत पोर्टल पर कुछ मरीजों को अस्पताल में भर्ती दिखाया गया, जबकि वे मौके पर मौजूद नहीं पाए गए। जांच में एक नवजात शिशु के रिकॉर्ड में डिस्चार्ज तिथि सहित अन्य विवरणों में कटिंग मिलने का भी दावा किया गया।
पुलिस के अनुसार बच्चे के पिता संदीप ने बयान दिया कि उसका बच्चा दोबारा अस्पताल में भर्ती नहीं हुआ था, जबकि पोर्टल पर उसे भर्ती दर्शाकर करीब 48 हजार रुपये का क्लेम किया गया। जांच एजेंसियों का यह भी दावा है कि रिकॉर्ड में कथित फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज मिले हैं। जिस चिकित्सक के नाम पर इलाज दर्शाया गया, उन्होंने भी अस्पताल आने तथा रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर और सील करने से इनकार किया।
बचाव पक्ष ने झूठा फंसाने का लगाया आरोप
बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि डॉ. बिजेंद्र टाक को झूठा फंसाया गया है। उनके अनुसार सभी बिल उपचार के अनुरूप आयुष्मान पोर्टल पर अपलोड किए गए थे और मामला पूरी तरह दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है। चूंकि सभी दस्तावेज पुलिस के कब्जे में हैं, इसलिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
वहीं राज्य पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी इस पूरे मामले का मुख्य व्यक्ति है और आयुष्मान भारत योजना के तहत कथित फर्जी क्लेम की जांच के लिए उससे पुलिस हिरासत में पूछताछ जरूरी है, ताकि पूरे नेटवर्क और संभावित अन्य मामलों का भी खुलासा हो सके। जिला अदालत के बाद अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा भी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद डॉ. बिजेंद्र टाक को इस मामले में बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है।
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