छात्र संगठनों को एक मंच पर लाने की दिग्विजय की पहल, हरियाणा में फिर गरमा सकती है छात्र राजनीति
punjabkesari.in Sunday, Aug 16, 2026 - 05:17 PM (IST)
चंडीगढ़( चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा की राजनीति में छात्र संगठनों को एक साझा मंच पर लाने की कवायद ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। जननायक जनता पार्टी यूथ विंग के प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौटाला ने ‘सामूहिक छात्र संघर्ष समिति’ के गठन का प्रस्ताव रखकर कांग्रेस, भाजपा, जेजेपी और इनेलो से जुड़े छात्र संगठनों के साथ-साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई एसएफआइ समेत सभी छात्र संगठनों को एक मंच पर आने का आह्वान किया है।
दिग्विजय की पहल का आधार राजनीतिक विचारधाराओं से अलग छात्र हितों के साझा मुद्दे हैं। फीस में बढ़ोतरी, छात्रावासों की कमी, शिक्षकों के रिक्त पद, परीक्षा परिणामों में देरी, रोजगार की चिंता और छात्र संघ चुनाव जैसे मुद्दे लगभग सभी विद्यार्थी संगठनों से जुड़े हैं। ऐसे में प्रस्तावित समिति इन मुद्दों पर शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और सरकार पर दबाव बनाने के साथ जरूरत पड़ने पर आंदोलन का साझा मंच बन सकती है।
प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव बना सबसे बड़ा मुद्दा
प्रस्तावित समिति के एजेंडे में सबसे अहम मुद्दा छात्र संघ चुनाव की बहाली हो सकता है। हरियाणा में तत्कालीन बंसीलाल सरकार ने वर्ष 1996 में छात्र संघ चुनाव बंद कर दिए थे। करीब 22 साल बाद अक्टूबर 2018 में चुनाव बहाल किए गए, लेकिन व्यवस्था प्रत्यक्ष चुनाव की बजाय अप्रत्यक्ष रही।
उस समय एनएसयूआइ, इनसो और एसएफआइ समेत कई छात्र संगठनों ने अप्रत्यक्ष चुनाव व्यवस्था का विरोध किया था। एबीवीपी भी प्रत्यक्ष चुनाव नहीं कराए जाने के पक्ष में नहीं थी। इसके बाद प्रदेश के कॉलेज परिसरों में छात्र संघ चुनाव की बहाली की मांग लगातार उठती रही, लेकिन नियमित और प्रत्यक्ष चुनाव का रास्ता नहीं खुल सका।
अप्रैल 2026 में भी दिग्विजय चौटाला ने प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर सरकार को तीन महीने का अल्टीमेटम दिया था। अब विभिन्न छात्र संगठनों को एक मंच पर लाने की उनकी नई पहल को उसी अभियान की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।
विचारधाराएं अलग, मुद्दे साझा
दिग्विजय की रणनीति की सबसे बड़ी ताकत यह है कि छात्र संगठनों के बीच वैचारिक मतभेदों को किनारे रखकर न्यूनतम साझा एजेंडा तैयार करने की कोशिश की जा रही है। फीस, हॉस्टल, शिक्षकों की उपलब्धता, परीक्षा परिणाम, रोजगार और चुनाव जैसे मुद्दे किसी एक राजनीतिक दल के नहीं, बल्कि व्यापक छात्र समुदाय से जुड़े हैं।
यदि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े संगठन इन मुद्दों पर संयुक्त कार्यक्रम बनाने में सफल होते हैं तो लंबे समय बाद हरियाणा के कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र राजनीति को नई सक्रियता मिल सकती है।
दिग्विजय के लिए संगठन विस्तार से बड़ी चुनौती एकजुटता
इस पहल की सबसे बड़ी परीक्षा अलग-अलग छात्र संगठनों को एक साथ बैठाने की होगी। कांग्रेस की एनएसयूआइ, भाजपा की एबीवीपी, जेजेपी की इनसो, इनेलो की आइएसओ और वामपंथी संगठनों की एसएफआइ की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।विशेष रूप से इनेलो के छात्र संगठन आइएसओ और जेजेपी के इनसो के बीच राजनीतिक दूरी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में दोनों को एक ही मंच पर लाना आसान नहीं होगा। समिति का नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा, यह भी अहम सवाल होगा।
दिग्विजय चौटाला पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि नेतृत्व का फैसला समिति बनने के बाद डेलीगेट सदस्य करेंगे और यह जरूरी नहीं कि नेतृत्व इनसो के हिस्से में ही आए। यह स्पष्टता इस पहल को किसी एक संगठन के नियंत्रण से बाहर रखने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है।
छात्र राजनीति रही है नेताओं की नर्सरी
हरियाणा में छात्र राजनीति लंबे समय से मुख्यधारा की राजनीति के लिए नेतृत्व तैयार करने वाली नर्सरी रही है। प्रदेश के कई बड़े राजनीतिक चेहरों ने छात्र और युवा राजनीति से अपनी सार्वजनिक पहचान बनाई। चौटाला परिवार की राजनीतिक यात्रा में भी छात्र और युवा संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।ऐसे में यदि कॉलेज परिसरों में दोबारा नियमित राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती हैं तो आने वाले वर्षों में छात्र राजनीति से नए नेतृत्व के उभरने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इसका असर केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
असली सवाल—साझा छात्र मंच या राजनीतिक धुरी?
दिग्विजय चौटाला की पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित समिति किसी एक राजनीतिक दल के संगठन विस्तार का माध्यम बनती है या वास्तव में छात्र हितों पर केंद्रित गैर-दलीय दबाव समूह के रूप में काम करती है।
यदि विभिन्न छात्र संगठन राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर न्यूनतम साझा एजेंडे पर सहमत होते हैं, तो यह पहल हरियाणा में छात्र राजनीति को नई दिशा दे सकती है। वहीं, यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा साझा मंच पर हावी हुई तो समिति का गठन ही सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।