सरकार की अनदेखी के कारण हरियाणा की संस्कृति नहीं बना पाई पंजाबी कल्चर की तरह पहचान : वर्मा

punjabkesari.in Saturday, Feb 26, 2022 - 06:12 PM (IST)

चंडीगढ़( चंद्रशेखर धरणी): ''सुनो कान खोल कर देश के नौजवानब मेरे देश की संस्कृति है सबसे महान'' यह संदेश लेकर पिछले 40 साल से लगातार हरियाणा की संस्कृति को पहचान दिलवाने के लिए संघर्ष कर रहे गांव मोरखा के जयदीप वर्मा जिन्हें अगर गॉड गिफ्टेड मैन कहा जाए या सर्वगुण संपन्न कहा जाए तो भी कुछ गलत नहीं होगा। ऐसी शख्सियत जो बांसुरी, बीन, हारमोनियम, बैंजो, गिटार और ढोलक बजाने में महारत हासिल किए हुए हैं। केवल साज- बाज ही नहीं यह गायन- वादन और कविताओं में भी एक बड़ी पहचान बना चुके हैं।

लगातार समाज में बढ़ रही बुराइयों के खिलाफ ना केवल सामाजिक रूप से खड़े होने का जज्बा इनमें मौजूद है, साथ ही वह सरकार की तरफ से जिला न्यायवादी की जिम्मेदारी को भी बखूबी निभा रहे हैं। 57 वर्ष के वर्मा अपनी छोटी सी उम्र में पहलवानी का शौक रखने के साथ-साथ बचपन से ही गायकी में एक बड़ा शौक पाले हुए थे। उम्र का पड़ाव पार करते-करते समाजिक ज्ञान वर्धन हुआ तो हरियाणा की संस्कृति-सभ्यता और विरासत को संभालने की आवश्यकता को समझते हुए वह लगातार बड़े-बड़े मंचों पर जाकर हरियाणवी कल्चर को बिखेरते रहे। वर्मा केवल प्रदेश- देश ही नहीं विश्व के बड़े-बड़े मंचों पर अपनी कला का लोहा मनवा चुके हैं।

इस शौक के साथ-साथ शिक्षा को महत्व देने का दौर चलता रहा और वकालत की पढ़ाई पूरी होने के बाद लगभग 15 वर्ष तक रोहतक में प्राइवेट तौर पर अधिवक्ता की प्रैक्टिस करते हुए गरीब पीड़ित लोगों को डंके की चोट पर इंसाफ देने का सिलसिला चलता रहा और डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी के पद पर सरकार ने उन्हें नियुक्त कर दिया। लंबे समय तक जिला भिवानी में भी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी रहे और 8 साल तक रोहतक आईजी कार्यालय में इस जिम्मेदारी को निभाया।

आज विश्व हरियाणा को नजदीक से जानना चाहता है 
पंजाब केसरी से बातचीत के दौरान वर्मा ने बताया कि इन सब चुनौतियों के बीच उन्होंने कभी अपने शौक और प्रदेश की संस्कृति को जिंदा रखने का अपना बीड़ा कमजोर नहीं पड़ने दिया। इन सबके बीच लगातार समय निकालकर इस काम को जारी रखा। आज वर्मा लगभग 250 भजन लिख चुके हैं। प्रदेश ही नहीं विश्व में उनके लाखों फॉलोअर्स है। लेकिन खासियत हमेशा यही रही कि मंच चाहे छोटा हो या बड़ा अपनी भाषा हरियाणवी में अपने शब्दों को प्रस्तुत करने को अपनी पहचान बनाया। वर्मा के अनुसार आज केवल हरियाणा ही नहीं पूरा विश्व हरियाणवी को सुनना और समझना चाहता है। हरियाणा की सभ्यता- संस्कृति और भाईचारे की एक अलग पहचान है।

लोग हरियाणा को नजदीक से जानना चाहते हैं। बड़े-बड़े मंचों और कार्यक्रमों में हरियाणवी की मांग है। हमारे बुजुर्गों ने अपनी रागनीयों के माध्यम से 100 साल पहले आज की परिस्थिति का ज्ञान दिया। जिन पर आज भी शोध हो रहा है। बावजूद इसके आज भी जितनी पहचान मिलनी चाहिए थी नहीं मिल पाई। कारण एकमात्र यही है कि उच्च कोटि पर बैठे राजनीतिक लोगों ने कभी यहां के कल्चर को प्रोत्साहन देने की कोशिश नहीं की। हरियाणवी कलाकारों को केवल मनोरंजन के तौर पर इस्तेमाल किया गया। समाज द्वारा भी खास तवज्जो कभी नहीं दी गई। हरियाणवी कलाकारों के लिए कभी समाज और सरकारों ने कोई सहयोग नहीं किया। जरूरत के वक्त ही केवल कलाकारों को याद किया गया। जिस कारण से आज पंजाबी कल्चर के मुकाबले हरियाणवी अपनी पहचान नहीं बना पाए।

नशे के खिलाफ एक बड़ी मुहिम चलाए हुए हैं 
इस बातचीत के दौरान वर्मा ने बड़ी खूबसूरत आध्यात्मिक कविता भी सुनाई। ''मुझे यह मिला- मुझे वह मिला। ना यह रहा- ना वह रहा। बचपन मिला- बचपन गया। यौवन मिला- यौवन गया। मिलता रहा- छिनता रहा। चलता रहा यह सिलसिला। अब तू मिला- सब कुछ मिला। अब ना है कोई इल्तजा। तू मिले कुछ ना मिले- ना होगा मुझे कुछ गिला। चलती रहे यह जिंदगी। करता रहूं तेरी बंदगी। हर हाल तू मुझ में रहे- हर ख्याल मैं तुझमें रहूं। कुछ हो तो मुझसे हो सिर्फ भला ही भला।

वर्मा ने कहा कि हरियाणवी संस्कृति-सभ्यता पवित्रता की प्रतीक है। लेकिन हरियाणवी कलाकार मंचों पर अपनी मातृभाषा का प्रयोग करने से भी डरते हैं।क्योंकि सरकार द्वारा सहयोग नहीं मिला। अगर सरकार हमारी संस्कृति को तवज्जो देती तो हमारे कलाकारों का हौसला बढ़ता। हरियाणवी कलाकारों द्वारा समय-समय पर लिखी देशभक्ति की रागनियां खूब प्रसिद्ध हुई। आज विश्व के लोग हरियाणवी गानों पर नाचते हैं। वर्मा ने बताया कि वह लगातार सामाजिक बुराइयों के खिलाफ कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं। खास तौर पर लेखनी के माध्यम से उन्होंने नशे पर खूब प्रहार किया है। तरह-तरह के भजन लिखकर सभ्यता को बचाने की लड़ाई लड़ने वाले वर्मा ने अपने कलाकारों से अपने प्रदेश की संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करने का संदेश देते हुए कहा कि जो राष्ट्र व समाज को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व नहीं होता, वह राष्ट्र और समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता। इसलिए गर्व से कहो हम हरियाणवी है।

 

 

 


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Content Writer

Isha

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