सरकार के खिलाफ ''गब्बर'' के सख्त तेवर, बोले- फ्री होल्ड पॉलिसी को लेकर प्रदर्शन होगा तो अनिल विज जनता के साथ खड़ा नजर आयेगा

punjabkesari.in Thursday, Aug 06, 2026 - 07:39 PM (IST)

 चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा की राजनीति में गुरुवार को उस समय बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब प्रदेश के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने अम्बाला छावनी की प्रस्तावित फ्री होल्ड (लैंड) पॉलिसी को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ बेहद सख्त तेवर दिखाए।

उन्होंने दो टूक कहा कि यदि सरकार ने जनता की भावनाओं के अनुरूप पॉलिसी में बदलाव नहीं किया और लोगों को आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा तो वह सरकार के साथ नहीं, बल्कि अम्बाला छावनी की जनता के साथ धरने, प्रदर्शन और संघर्ष में खड़े दिखाई देंगे।

भाजपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों की एक बड़ी पंचायत को संबोधित करते हुए विज ने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता आगामी कैबिनेट बैठक में इस नीति में व्यापक संशोधन कराकर इसे जनहितैषी बनवाने की होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो जनता को संगठित होकर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा और आवश्यकता पड़ने पर बड़ा जनआंदोलन भी करना होगा।

कैबिनेट में रुकवाई थी फ्री होल्ड पॉलिसी
अनिल विज ने खुलासा किया कि अम्बाला छावनी की फ्री होल्ड पॉलिसी हाल ही में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी के लिए लाई गई थी। उन्होंने दावा किया कि अधिकारियों ने इसे पारित कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने स्पष्ट कहा कि जिस क्षेत्र का वह सात बार विधायक रहे हैं, वहां की इतनी महत्वपूर्ण नीति बनाते समय उनसे कोई राय तक नहीं ली गई।अधिकारियों ने मीटिंग में जब यह पॉलिसी पढ़नी शुरू की और इसे पास करने का प्रस्ताव रखा तो

उन्होंने कहा कि “मुख्यमंत्री जी अम्बाला छावनी की लैंड पॉलिसी बनाई जा रही है और वह अम्बाला छावनी के नुमाइंदे है, उनसे एक बार भी इस बारे नहीं पूछा गया, वह एक बार नहीं सात बार अम्बाला छावनी से विधायक है, इस पॉलिसी में क्या है क्या नहीं है, अम्बाला के लोग क्या चाहते है इसपर एक बार भी मुझसे नहीं पूछा गया”।

इस पर मुख्य सचिव ने इस एजेंडे को पास करने को कहा, मगर उन्होंने इस एजेंडे पर अड़ते हुए एजेंडे को डेफर करने को कहा। इसपर उन्होंने मुख्यमंत्री जी को कहा कि “आप इस मसले पर मीटिंग बुला लो, मीटिंग में मुझे बुला लो और इसमें उन सभी लोगों शामिल करो जिन्होंने पॉलिसी बनाई, इसके बाद सभी पक्षों को सुना जाए और फिर निर्णय लिया जाए”। 

विज के अनुसार उन्होंने कैबिनेट में यह मुद्दा मजबूती से उठाया और कहा कि पहले सभी पक्षों से चर्चा होनी चाहिए। उनके विरोध के कारण यह एजेंडा तत्काल स्थगित (डेफर) कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि यदि उस दिन यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता तो आज अम्बाला छावनी के हजारों लोग गंभीर कानूनी और आर्थिक संकट में फंस जाते।

'यह केवल सदर का नहीं, पूरी छावनी का मुद्दा'
विज ने कहा कि कुछ लोग इसे केवल सदर क्षेत्र का मामला समझ रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि इसका असर पूरे अम्बाला छावनी क्षेत्र पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि वह अम्बाला छावनी के इतिहास, भूमि व्यवस्था और यहां की प्रशासनिक पृष्ठभूमि को पूरी तरह जानते हैं। इसलिए लोगों को भ्रमित होने के बजाय एकजुट होकर इस लड़ाई को लड़ना होगा।

1977 के फैसले से शुरू हुई पूरी कहानी
अपने संबोधन में विज ने अम्बाला छावनी की भूमि व्यवस्था का पूरा इतिहास भी सामने रखा। उन्होंने बताया कि 5 फरवरी 1977 तक यह पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन था। उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में लगभग 1063 एकड़ भूमि को कैंटोनमेंट बोर्ड से अलग कर नगर पालिका क्षेत्र बनाया गया।

इस समझौते के तहत हरियाणा सरकार को भारत सरकार की भूमि का स्वामित्व मिलना था, लेकिन बदले में सेना की पसंद की 150 एकड़ जमीन नि:शुल्क उपलब्ध करानी थी।
विज ने कहा कि वर्ष 2000 तक किसी सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं उठाया। बाद में उनके प्रयासों से सेना को 150 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई गई, जिससे समझौते की शर्त पूरी हुई।

रजिस्ट्री विवाद ने बढ़ाई लोगों की परेशानी
विज ने बताया कि लंबे समय तक लोगों की संपत्तियों की रजिस्ट्री सामान्य रूप से होती रही, लेकिन बाद में रजिस्ट्री में यह लिखा जाने लगा कि केवल भवन या ढांचे की रजिस्ट्री होगी, जमीन की नहीं, क्योंकि जमीन का मालिक सरकार है।
यहीं से समस्याओं की शुरुआत हुई।
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के कारण—
बैंकों ने संपत्तियों पर ऋण देना लगभग बंद कर दिया।
भवनों के नक्शे पास होने में दिक्कत आने लगी।
संपत्तियों का विभाजन और उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रियाएं प्रभावित हुईं।
निवेश और व्यापारिक गतिविधियां भी प्रभावित हुईं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद बनी नई पॉलिसी
विज ने बताया कि एक भूमि कब्जे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को अम्बाला छावनी के लिए स्पष्ट लैंड/फ्री होल्ड पॉलिसी बनाने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद मुख्य सचिव ने अदालत में भरोसा दिया कि सरकार नई नीति तैयार करेगी और उसी के आधार पर यह प्रस्ताव तैयार किया गया।
पॉलिसी की इन शर्तों पर विज ने उठाए सवाल
विज ने कहा कि उन्होंने स्वयं वकीलों के साथ बैठकर पूरी नीति का अध्ययन किया और उसमें कई गंभीर आपत्तिजनक प्रावधान पाए।
उनके अनुसार प्रस्तावित नीति में—
पूरी जमीन का कलेक्टर रेट के आधार पर भुगतान करना होगा।
आवेदन करते समय ही 25 प्रतिशत राशि जमा करनी होगी।
शेष राशि एक वर्ष के भीतर जमा करना अनिवार्य होगा।
समय पर भुगतान नहीं करने पर संपत्ति सील कर सरकार अपने कब्जे में ले सकेगी।
सरकार बाद में उस संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को बेच भी सकेगी।
फ्री होल्ड कराने के लिए मूल दस्तावेज जमा करने होंगे।
विज ने कहा कि डेढ़ सौ वर्ष पुराने दस्तावेज अधिकांश परिवारों के पास उपलब्ध ही नहीं हैं। ऐसे में हजारों लोग केवल दस्तावेजों के अभाव में अपने अधिकारों से वंचित हो जाएंगे।
'गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा सबसे ज्यादा बोझ'
अनिल विज ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास 1000 गज की जमीन है और उसका कलेक्टर रेट 60 हजार रुपये प्रति गज है, तो उसे करोड़ों रुपये जमा कराने होंगे।
उनके अनुसार इतनी बड़ी राशि सामान्य परिवारों के लिए देना संभव नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि यह नीति आम नागरिकों को राहत देने के बजाय उन्हें आर्थिक संकट में धकेल सकती है।

कोर्ट और जनआंदोलन, दोनों के लिए तैयार रहने की अपील
विज ने लोगों से कहा कि यदि सरकार उनकी बात नहीं मानती तो शहर स्तर पर एक मजबूत संघर्ष समिति बनाई जानी चाहिए जो कानूनी लड़ाई भी लड़े और जनता को संगठित भी करे।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल की नहीं बल्कि आम नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की लड़ाई है।
 

'सरकार से भी लड़ना पड़ा तो पीछे नहीं हटूंगा'
अपने संबोधन के सबसे चर्चित हिस्से में अनिल विज ने कहा कि यदि अम्बाला छावनी के लोगों को अपने वैध अधिकारों के लिए सरकार के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा तो वह सरकार के साथ नहीं बल्कि जनता के साथ खड़े होंगे।
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो धरने होंगे, प्रदर्शन होंगे, रैलियां होंगी और वह स्वयं जनता के साथ बैठेंगे।

उनका यह बयान प्रदेश की राजनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह स्वयं राज्य सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री हैं और अपनी ही सरकार की प्रस्तावित नीति पर खुलकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।
 

राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व
अनिल विज का यह रुख केवल अम्बाला छावनी तक सीमित नहीं माना जा रहा। यदि सरकार इस नीति में संशोधन करती है तो यह प्रदेश में जनभावनाओं के अनुरूप नीति निर्माण का बड़ा उदाहरण होगा। वहीं यदि मतभेद बने रहते हैं तो यह मामला कैबिनेट, अदालत और सड़कों तक पहुंच सकता है।

फिलहाल निगाहें अगली कैबिनेट बैठक पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि सरकार विज की आपत्तियों को स्वीकार कर नीति में बदलाव करती है या फिर यह मुद्दा प्रदेश के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक का रूप लेता है।

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Content Editor

Krishan Rana

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