सुहागिनों ने श्रद्धा और उल्लास से मनाया करवा चौथ का पर्व, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखा निर्जला व्रत
punjabkesari.in Thursday, Oct 29, 2026 - 07:04 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): करवा चौथ का पर्व विवाहित महिलाओं ने धूमधाम, श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया। इस अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखा। दिनभर व्रत रखने के बाद महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य दिया। इसके बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला।
अंजू भारद्वाज ने बताया कि करवा चौथ भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह त्योहार पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण और आपसी रिश्तों की मजबूती का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं। मान्यता है कि करवा चौथ का व्रत वैवाहिक जीवन में प्रेम, मधुरता और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ अखंड सौभाग्य की कामना से किया जाता है।
उन्होंने बताया कि करवा चौथ पर धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व है। महिलाएं माता पार्वती, भगवान शिव और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं। इसके साथ ही करवा माता और वीरावाली की कथा सुनने की भी परंपरा है। पूजा के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की।
अंजू भारद्वाज ने कहा कि करवा चौथ केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने का अवसर भी है। इस पर्व पर सास की ओर से बहू को सरगी देने और बहू की ओर से बया की परंपरा निभाने का विशेष महत्व है। इन परंपराओं के माध्यम से परिवार में आपसी प्रेम, सम्मान और अपनापन बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि करवा चौथ महिलाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का भी माध्यम है। इस दिन महिलाएं एकत्रित होकर पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं। इससे आपसी भाईचारा, सौहार्द और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा मिलता है।
करवा चौथ के अवसर पर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक परिधानों, सोलह शृंगार, मेहंदी और पूजा की तैयारियों ने पर्व की रौनक बढ़ा दी। चंद्रोदय के समय महिलाओं ने छलनी से चंद्रमा और अपने पति के दर्शन कर व्रत पूरा किया। पूरे दिन धार्मिक आस्था और उत्सव का माहौल बना रहा।
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