नायब सैनी-सुखबीर बादल मुलाकात ने खोला नए सियासी समीकरणों का रास्ता, क्या फिर साथ आएंगे भाजपा-अकाली दल?

punjabkesari.in Saturday, Aug 08, 2026 - 03:57 PM (IST)

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : पंजाब की सियासत में एक पुराना सवाल फिर नए अंदाज में खड़ा हो गया है—क्या कभी ढाई दशक तक एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद राजनीतिक साझेदार रहे भाजपा और शिरोमणि अकाली दल फिर एक मंच पर आ सकते हैं? हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की चंडीगढ़ में हुई उच्चस्तरीय मुलाकात तथा इसके बाद सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने इस सवाल को और हवा दे दी है।

हालांकि भाजपा और अकाली दल की ओर से गठबंधन को लेकर अभी कोई औपचारिक बातचीत या घोषणा नहीं हुई है। भाजपा का सार्वजनिक रुख फिलहाल पंजाब में अपने दम पर चुनावी तैयारी करने का है। लेकिन राजनीति में सिर्फ आधिकारिक बयानों से तस्वीर पूरी नहीं होती। नेताओं की मुलाकातें, संपर्क अभियान और बंद दरवाजों के पीछे होने वाली राजनीतिक बातचीत कई बार भविष्य के समीकरणों का संकेत दे देती हैं।इसी लिहाज से नायब सैनी और सुखबीर बादल की मुलाकात को पंजाब की आगामी राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है।

सैनी क्यों बने पंजाब के सियासी समीकरण में महत्वपूर्ण?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण नाम नायब सिंह सैनी का है। हरियाणा के मुख्यमंत्री होने के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने उन्हें पंजाब में पार्टी के संगठनात्मक और राजनीतिक विस्तार की अहम जिम्मेदारी दी है। सैनी लगातार पंजाब में सक्रिय हैं और पार्टी संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक वर्गों के प्रभावशाली लोगों से संवाद बढ़ा रहे हैं।

सैनी की राजनीतिक उपयोगिता सिर्फ इस वजह से नहीं है कि वे हरियाणा के मुख्यमंत्री हैं। वे पंजाब की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों से परिचित हैं तथा हरियाणा और पंजाब की राजनीति के बीच स्वाभाविक संपर्क भी रखते हैं। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनका सीधा संवाद भी उन्हें इस भूमिका में महत्वपूर्ण बनाता है।यही कारण है कि सुखबीर बादल की सैनी से मुलाकात को राजनीतिक हलकों में खास महत्व दिया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि इस मुलाकात में क्या बात हुई, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या सैनी ने सुखबीर बादल की राजनीतिक बात भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने की भूमिका निभाई है? अगर आने वाले दिनों में भाजपा-अकाली संवाद आगे बढ़ता है तो सैनी इस प्रक्रिया में पर्दे के पीछे या सामने एक अहम कड़ी हो सकते हैं।

सुखबीर बादल क्यों बढ़ा रहे हैं भाजपा से नजदीकी?

सुखबीर बादल की मौजूदा राजनीतिक सक्रियता को भी इसी संदर्भ में देखना होगा। अकाली दल लंबे समय से पंजाब में अपने राजनीतिक आधार को पुनर्गठित करने की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे में भाजपा के साथ पुराने रिश्तों को नए राजनीतिक समीकरण में बदलने की संभावना अकाली दल के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।राजनीतिक सूत्रों के अनुसार सुखबीर बादल भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सहित भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से उनकी मुलाकातों की चर्चा है। आरएसएस के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों से संपर्क की भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है।इसके बाद संसद के सेंट्रल हॉल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात ने चर्चाओं को और तेज कर दिया। हालांकि इस मुलाकात का एजेंडा सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे सामान्य मुलाकात मानकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।

दिल्ली में भी लॉबिंग तेज?

सुखबीर बादल की कोशिश सिर्फ एक-दो भाजपा नेताओं तक सीमित नहीं बताई जा रही। सूत्रों के मुताबिक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल सहित पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच बनाने की कोशिशें भी जारी हैं। यदि यह संपर्क अभियान वास्तव में गठबंधन की संभावनाएं तलाशने के लिए है तो इसका अर्थ साफ है—अकाली नेतृत्व भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि पंजाब में दोनों दलों का साथ आना दोनों के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है।लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की मौजूदा रणनीति है।

भाजपा फिलहाल अकेले चलने के मूड में

भाजपा ने पंजाब में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अपना संगठनात्मक आधार बढ़ाने पर काफी जोर दिया है। पार्टी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि लंबे समय तक अकाली दल के साथ गठबंधन में रहने के कारण पंजाब में भाजपा अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान उतनी मजबूत नहीं कर पाई, जितनी वह चाहती थी। इसीलिए पार्टी का मौजूदा सार्वजनिक संदेश पंजाब में अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी का है। भाजपा के कई राष्ट्रीय नेता यह संकेत दे चुके हैं कि पार्टी राज्य में अपने संगठन और जनाधार को स्वतंत्र रूप से विस्तार देना चाहती है।यही बिंदु किसी भी संभावित गठबंधन के रास्ते में सबसे बड़ी राजनीतिक दीवार है।यदि भाजपा को लगता है कि अकेले चुनाव लड़ने से वह अपने वोट शेयर और सीटों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकती है तो पार्टी पुराने गठबंधन की ओर लौटने में जल्दबाजी नहीं करेगी।

25 साल का साथ और फिर अचानक टूट गया रिश्ता

भाजपा और अकाली दल का रिश्ता कोई सामान्य चुनावी गठबंधन नहीं था। दोनों दल लगभग 25 वर्षों तक पंजाब की राजनीति में एक-दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी रहे। अकाली दल का ग्रामीण और सिख वोट आधार तथा भाजपा का शहरी, व्यापारी और हिंदू वोट आधार एक-दूसरे के पूरक माने जाते थे।दोनों दलों ने मिलकर पंजाब में सरकारें बनाईं। केंद्र में भी अकाली दल को प्रतिनिधित्व मिला। हरसिमरत कौर बादल का मोदी सरकार में मंत्री रहना इस रिश्ते की मजबूती का बड़ा उदाहरण था।लेकिन कृषि कानूनों ने इस राजनीतिक साझेदारी को खत्म कर दिया।सितंबर 2020 में किसान आंदोलन के बीच अकाली दल ने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का विरोध किया। 17 सितंबर को हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और 26 सितंबर 2020 को अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया।ढाई दशक पुराना रिश्ता एक झटके में खत्म हो गया।

2024 में करीब आए, लेकिन बात नहीं बनी

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले भाजपा और अकाली दल के बीच फिर गठबंधन की चर्चाएं चलीं। कई दौर की बातचीत भी हुई, लेकिन सीटों के बंटवारे और राजनीतिक परिस्थितियों पर सहमति नहीं बन सकी।दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे।इसके बाद भी राजनीतिक संपर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यही वजह है कि आज सुखबीर बादल की भाजपा नेताओं से मुलाकातों को एक बड़े राजनीतिक प्रयोग की संभावित शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।क्या सैनी बन सकते हैं भाजपा-अकाली रिश्तों के ‘गेम चेंजर’?यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है।यदि भाजपा और अकाली दल के बीच बातचीत आगे बढ़ती है तो नायब सिंह सैनी की भूमिका महज एक मध्यस्थ तक सीमित नहीं होगी। वह दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक विश्वास बहाली में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।सैनी के लिए यह केवल पंजाब में भाजपा संगठन विस्तार का मामला नहीं है। हरियाणा और पंजाब के बीच राजनीतिक, सामाजिक और भौगोलिक संबंध भी उन्हें इस भूमिका में स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं।लेकिन यह भी स्पष्ट है कि सैनी अकेले कोई गठबंधन तय नहीं कर सकते। अंतिम फैसला भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ही करना होगा।

सबसे बड़ा सवाल—क्या भाजपा को अकाली दल की जरूरत है?

यही वह सवाल है जिसका जवाब भविष्य की दिशा तय करेगा।अकाली दल के लिए भाजपा के साथ आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन भाजपा के लिए सवाल अलग है। पार्टी को तय करना होगा कि पंजाब में अपने दम पर विस्तार की रणनीति ज्यादा लाभकारी है या पुराने सहयोगी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना।यदि भाजपा को लगता है कि अकाली दल का पारंपरिक ग्रामीण आधार अभी भी चुनावी रूप से प्रभावशाली है, तो दोनों के बीच तालमेल की संभावना बढ़ सकती है। दूसरी तरफ यदि भाजपा अपने मौजूदा विस्तार को रोकना नहीं चाहती तो पार्टी अकेले चुनाव लड़ने का फैसला बरकरार रख सकती है।इसलिए फिलहाल गेंद पूरी तरह भाजपा के पाले में है।

पंजाब में अभी सिर्फ अटकलें, लेकिन सियासी हलचल वास्तविक

नायब सैनी और सुखबीर बादल की मुलाकात से गठबंधन तय नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी से सुखबीर बादल की मुलाकात भी अपने आप में गठबंधन की पुष्टि नहीं करती। लेकिन इन घटनाक्रमों ने यह जरूर साबित कर दिया है कि भाजपा-अकाली रिश्तों का अध्याय पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।सुखबीर बादल राजनीतिक दरवाजे खटखटा रहे हैं। भाजपा फिलहाल दरवाजा खोलने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रही, लेकिन संवाद की संभावनाओं को पूरी तरह नकारना भी मुश्किल है।और इस पूरी कहानी में नायब सिंह सैनी वह नाम बनकर उभरे हैं, जिन पर पंजाब की राजनीति में आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर रहेगी।यदि भाजपा और अकाली दल के बीच पुराना रिश्ता किसी नए रूप में लौटता है तो उसकी पहली राजनीतिक पटकथा भले दिल्ली में लिखी जाए, लेकिन उसका एक महत्वपूर्ण अध्याय चंडीगढ़ में नायब सैनी और सुखबीर बादल की मुलाकात से शुरू हुआ माना जा सकता है।


 


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Content Editor

Harman

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