बड़ा फैसला: सिर्फ शक के आधार पर पुलिस अधिकारियों के करियर पर नहीं लगा सकते दाग, दुष्कर्म मामले में आरोपी बरी
punjabkesari.in Thursday, Jul 16, 2026 - 08:28 AM (IST)
चंडीगढ़,: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक अधिकारियों पर ऐसे प्रतिकूल निष्कर्ष, जिनसे उनके सेवा जीवन या पेशेवर प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता हो, केवल अनुमान या संदेह के आधार पर दर्ज नहीं किए जा सकते।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा तभी संभव है, जब रिकार्ड पर उपलब्ध सामग्री से उनके जानबूझ कर किए गए कदाचार या कर्तव्य में जानबूझ कर चूक का स्पष्ट प्रमाण हो। जस्टिस नीरजा के कलसन ने 2016 के दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभदेकर बरी कर दिया। साथ ही जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की 3 याचिकाएं भी मंजूर करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और उनसे जुड़े निर्देशों को निरस्त कर दिया।
मामले की शुरूआत 23-24 सितंबर 2016 की रात दर्ज एफ. आई. आर. से हुई थी, जिसमें महिला ने अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगाए थे। रोहतक की अतिरिक्त सत्र अदालत ने सितंबर 2018 में आरोपित को भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर त्रुटिपूर्ण या अपूर्ण जांच अपने आप में जांच अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने कहा कि व्यवस्था संबंधी कमियों, निर्णय संबंधी त्रुटियों या कमजोर जांच और जानबूझ कर किए गए कदाचार अथवा दुर्भावनापूर्ण आचरण के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित पुलिस अधिकारियों का चालान पेश होने से पहले ही तबादला हो चुका था और ट्रायल कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे जांच में कथित कमियों के लिए उनकी प्रत्यक्ष भूमिका सिद्ध होती। इतना ही नहीं, उन्हें अपना पक्ष रखने का सार्थक अवसर भी नहीं दिया गया।