Haryana : मेडिकल आधार पर रिटायर सैनिकों की दिव्यांग पेंशन नहीं रोकी जा सकती, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का अहम फैसला
punjabkesari.in Wednesday, Jul 29, 2026 - 08:48 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मेडिकल आधार पर सेना से सेवा मुक्त किए गए सैनिकों के हित में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी सैन्यकर्मी को दिव्यांगता के कारण सेवा से बाहर किया गया है तो बाद में उसकी दिव्यांगता 20 प्रतिशत से कम आंकी जाने के आधार पर उसकी दिव्यांग पेंशन समाप्त नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सैनिक को राउंडिंग ऑफ का लाभ भी मिलेगा।
जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल), चंडीगढ़ के 14 जुलाई 2023 के आदेश को सही ठहराया।
मामले के अनुसार रतन चंद को 31 जुलाई 1989 को क्रॉनिक ड्यूओडेनल अल्सर के कारण मेडिकल आधार पर सेना से सेवा मुक्त किया गया था। उस समय रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता 30 प्रतिशत मानी थी और इसे सैन्य सेवा के कारण बढ़ी हुई दिव्यांगता स्वीकार किया था। हालांकि वर्ष 1994 में प्रधान नियंत्रक रक्षा लेखा (पेंशन), इलाहाबाद ने उनकी दिव्यांगता 15 से 19 प्रतिशत आंकी और 20 जून 1994 से उनकी दिव्यांग पेंशन बंद कर दी।
इसके खिलाफ रतन चंद ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए दिव्यांग पेंशन बहाल करने और 30 प्रतिशत दिव्यांगता को राउंडिंग ऑफ के आधार पर 50 प्रतिशत मानकर लाभ देने का आदेश दिया। इसी आदेश को केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि रतन चंद को 30 प्रतिशत दिव्यांगता के आधार पर सेना से सेवा मुक्त किया गया था और यह दिव्यांगता सैन्य सेवा से संबंधित मानी गई थी। ऐसे में बाद में दिव्यांगता का प्रतिशत कम आंकने के आधार पर पेंशन समाप्त करना कानून सम्मत नहीं है।
खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी सैनिक को दिव्यांगता के कारण सेवा से बाहर किया जाता है तो यह माना जाएगा कि उसकी दिव्यांगता 20 प्रतिशत से अधिक थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि 30 प्रतिशत दिव्यांगता को राउंडिंग ऑफ के जरिए 50 प्रतिशत मानकर पेंशन लाभ देना स्थापित कानूनी सिद्धांत है और केंद्र सरकार इस सिद्धांत को चुनौती देने में असफल रही।
अदालत ने कहा कि आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का आदेश पूरी तरह स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।
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