अमानवीयता की हदें पार, डॉक्टरों के सामने 22 घंटे तक बास्केट में तड़पती रही प्रीमैच्योर बच्ची

5/26/2020 10:04:12 PM

सोनीपत (ब्यूरो): ऐसा करूण दृश्य कि मानवता कांप उठे। मामला सोनीपत के गांधी चौक पर स्थित एक निजी अस्पताल का है। यहां दाखिल एक गर्भवती महिला ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। प्रीमैच्योर होने के कारण एक बच्चे की जन्म लेते ही मौत हो गई जबकि दूसरी बच्ची जिंदा रही। यहां से घोर अमानवीयता शुरू हुई।

जिंदा बच्ची को अंडरवेट बताते हुए एक खाली कूड़ेदान जैसी बास्केट में डाल दिया गया, जिसमें बच्ची तड़पती रही। कमाल की बात यह है कि शिकायत देने के बाद पहुंची पुलिस भी इस मामले में कुछ नहीं कर पाई और बच्ची को बास्केट में तड़पता छोड़ चली गई। शिकायतकर्ता ने अगले दिन सुबह जानकारी ली तो आश्चर्यजनक रूप से बच्ची बास्केट में ही तड़प रही थी और उसके मरने का इंतजार किया जा रहा था।

22 घंटे के बाद बच्ची को नागरिक अस्पताल में दाखिल करवाया
दोबारा पुलिस को शिकायत किए जाने पर करीब 22 घंटे के बाद बच्ची को नागरिक अस्पताल में दाखिल करवाया गया, जहां पर उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले की वीडियो बनाकर वायरल की है। अस्पताल की ओर से बताया गया है कि बच्ची बेहद नाजुक स्थिति में थी। उसे न तो बचाया जा सकता था और न ही नर्सरी में दाखिल किया जा सकता था। 

प्रभु नगर निवासी रवि दहिया ने बताया कि 25 मई को शाम के समय उसे पता चला कि गांधी चौक पर एक निजी अस्पताल में एक बच्ची कूड़ेदान जैसी बास्केट में पड़ी है। इस पर वह मौके पर पहुंचा और अस्पताल के स्टाफ से बच्ची को इस तरह तड़पते हुए छोडऩे का कारण पूछा। जब किसी ने कोई जानकारी नहीं दी तो उसने 100 नम्बर पर पुलिस को फोन किया। थाना

सिविल लाइन पुलिस से दो पुलिस कर्मी मौके पर पहुंचे और अस्पताल की मुख्य चिकित्सक से बच्ची के बास्केट में पड़े रहने का कारण पूछा। इस पर चिकित्सका पुलिस को बताया कि बच्ची प्रीमैच्योर है और अंडरवेट है। उसे बचाना मुश्किल है। यही कारण है कि उसे बास्केट में डाला गया है। 

किसी ने नहीं सुनी तो विधायक पुत्र को लेकर पहुंचा शिकायतकर्ता 
शिकायतकर्ता रवि दहिया ने बताया कि वह बार-बार पुलिस व अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाता रहा कि बच्ची को इस तरह मरने के लिए न छोड़ा जाए, लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। इस पर वह विधायक सुरेंद्र पंवार के पास गया और वहां से उनके पुत्र ललित को लेकर मौके पर पहुंचा। ललित ने भी अस्पताल प्रशासन से कहा कि आखिर बच्ची को इस प्रकार तड़पते हुए लावारिस क्यों छोड़ दिया गया, लेकिन अस्पताल प्रशासन टालमटोल करता रहा। शिकायतकर्ता की जिद के कारण ही बच्ची 22 घंटे बाद नागरिक अस्पताल में पहुंचाया गया। 

22 घंटे बाद भी जिंदा रही बच्ची 
जिस बच्ची की जिंदगी चिकित्सका द्वारा केवल 4-5 घंटे बताई जा रही थी, वह जन्म के 22 घंटे बाद भी जिंदा रही और शिकायतकर्ता की सतर्कता के कारण आखिर उसे नागरिक अस्पताल में पहुंचाना ही पड़ा। नागरिक अस्पताल में ईलाज के दौरान बच्ची की मौत हो गई। चिकित्सकों ने बताया कि बच्ची को बचाना मुुश्किल था क्योंकि वह मात्र साढ़े 300 ग्राम वजन की थी। 

विशेषज्ञ बोले, मरने के लिए छोडऩा गलत
शहर के वरिष्ठ चिकित्सक डा. ओ.पी. परूथी ने बताया कि प्रीमैच्याेर बच्चा भी यदि जिंदा है और अंडरवेट है तो उसे मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। उसे कम से कम इक्वीलेटर पर रखा जाना चाहिए था। मरने के लिए बच्चे को छोडऩा घोर अमानवीयता है। यह बात ठीक है कि अंडरवेट व प्री मैच्योर बच्चे को बचाना बेहद मुश्किल है।

वहीं, इस संबंध में नागरिक अस्पताल के पी.एम.ओ. डा. आदर्श ने बताया कि उनके पास प्रीमैच्योर बच्ची आई थी, जिसका वजन केवल साढ़े 300 ग्राम था। ऐसे में बच्ची को बचाना मुश्किल था, लेकिन दाखिल कर लिया गया। कुछ ही देर में उपचार के दौरान बच्ची की मौत हो गई। 

दर्पन कुमार, एस.एच.ओ., थाना सिविल लाइन ने कहा कि रवि दहिया ने शिकायत दी है। उसने बताया है कि बच्ची को एक बास्केट में डाला गया था। उसका इलाज नहीं किया गया। उनकी शिकायत पर चिकित्सकों के बयान ले लिए गए हैं। जांच की जा रही है। 


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Edited By

vinod kumar

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