जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान मिंटू हत्याकांड में 3 दोषियों को हाईकोर्ट से राहत, उम्रकैद का फैसला रद्द, घायल चश्मदीदों ने आरोपितों को नहीं पहचाना
punjabkesari.in Thursday, Oct 15, 2026 - 08:44 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिसार के हांसी क्षेत्र में हुई हिंसा और मिंटू की हत्या के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 आरोपितों को बड़ी राहत दी है।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर संदेह और आरोपितों के खिलाफ अपराध साबित नहीं होने के आधार पर निचली अदालत का फैसला रद करते हुए दलजीत उर्फ जलजीत, पवन उर्फ पोना और सुरेंद्र उर्फ झंडा को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, हिसार ने तीनों को हत्या सहित विभिन्न गंभीर अपराधों में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामला फरवरी 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 22 फरवरी को हिसार के धनी पाल क्षेत्र में शांति की ढाणी पर 70 से 75 लोगों की भीड़ ने हमला किया था। इस दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें मिंटू और कृष्ण घायल हो गए। मिंटू की बाद में मृत्यु हो गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हमलावरों ने गोलीबारी के साथ ढाणी में लूटपाट की और आग भी लगा दी।
अभियोजन का मामला घायल प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और हथियारों की बरामदगी पर आधारित था। हालांकि, सुनवाई के दौरान घायल कृष्ण, हरफूल सिंह और शिकायतकर्ता राम अवतार ने आरोपितों के खिलाफ अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। तीनों को पक्षद्रोही घोषित किया गया। कृष्ण ने कहा कि वह हमलावरों की पहचान नहीं कर सकता और अदालत में मौजूद आरोपितों ने उसे चोटें नहीं पहुंचाई थीं। हरफूल सिंह ने भी आरोपितों को हमलावर मानने से इन्कार किया। राम अवतार ने कहा कि आरोपितों ने उसकी बुआ शांति की ढाणी पर हमला नहीं किया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि जिस हथियार को मिंटू की हत्या से जोड़कर पेश किया गया, वह दूसरे मामले में बलवंत उर्फ बल्लू से बरामद हुआ था। इस हथियार को वर्तमान मामले में दो साल से अधिक समय बाद शामिल किया गया और एफएसएल रिपोर्ट मिलने के बाद पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया। अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष हथियार को दूसरे मामले से इस मामले में स्थानांतरित करने में हुई असाधारण देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सका।
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि बलवंत ने अपने बयान में हथियार सोनू गुर्जर से आठ हजार रुपये में खरीदने की बात कही थी, जबकि अभियोजन का आरोप था कि दलजीत ने हथियार बलवंत को सौंपा था। अदालत ने इस विरोधाभास और हथियार की बरामदगी से जुड़े संदेहों को महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपितों के विरुद्ध आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने तीनों की दोषसिद्धि और सजा रद कर दी तथा उन्हें आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
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