जिस लकीर ने मुझे हरियाणवी बनाया, उसी ने मेरी पहचान गढ़ी : राजेश खुल्लर

punjabkesari.in Monday, Oct 26, 2026 - 06:46 PM (IST)

चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा सरकार में मुख्यमंत्री के मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर के लिए हरियाणा केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक ऐसी पहचान है, जिसे उनके माता-पिता ने छह दशक पहले एक ऐतिहासिक फैसले के साथ चुना था। 

1 नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा का गठन हुआ, तब राजेश खुल्लर की उम्र महज तीन वर्ष थी। उस समय उनके माता-पिता ने जनगणना के दौरान अपनी मातृभाषा पंजाबी होने के बावजूद हिंदी दर्ज कराई थी। यह फैसला केवल भाषा का चयन नहीं था, बल्कि उस हरियाणा के साथ जुड़ने का संकल्प था, जो उस समय अपने अस्तित्व और भविष्य की चुनौतियों से जूझ रहा था।

हरियाणा दिवस के अवसर पर राजेश खुल्लर के विचारों में प्रदेश के जन्म से लेकर उसके विकास, प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक बदलाव और भविष्य की चुनौतियों तक की एक लंबी यात्रा दिखाई देती है। उनकी जीवन-कथा इस बात का उदाहरण है कि किस तरह एक व्यक्ति की पहचान और एक प्रदेश का विकास समय के साथ एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

जब हरियाणा के भविष्य पर उठते थे सवाल
राजेश खुल्लर के अनुसार, हरियाणा का गठन ऐसे समय हुआ था, जब इसे पंजाब का अपेक्षाकृत पिछड़ा और संसाधनों की कमी वाला हिस्सा माना जाता था। यहां औद्योगिक ढांचा सीमित था, सड़कों और नहरों के विस्तार की जरूरत थी तथा आर्थिक संसाधन भी कम थे। उस समय कई लोगों को आशंका थी कि नया राज्य कुछ ही वर्षों में आर्थिक संकट का सामना करेगा और सरकार के लिए अपने कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाएगा। लेकिन हरियाणा ने इन आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए अपनी विकास यात्रा जारी रखी। खेती, उद्योग, आधारभूत ढांचे, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में प्रदेश ने अपनी अलग पहचान बनाई।

राजेश खुल्लर के विचारों के मुताबिक, हरियाणा की यह यात्रा मेहनत, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति की कहानी है। प्रदेश ने तब काम करना शुरू कर दिया था, जब उसके पास विकास के लिए जरूरी सभी साधन उपलब्ध नहीं थे।

पंजाबी परिवेश में पढ़ाई, हिंदी में शिक्षा और अंग्रेजी में परीक्षा
राजेश खुल्लर का बचपन अंबाला शहर में बीता। हरियाणा के गठन के समय वह एक निजी स्कूल में पढ़ते थे, जहां सामान्य बोलचाल की भाषा पंजाबी थी। बाद में पाठ्यपुस्तकें हिंदी में आईं। शिक्षकों और विद्यार्थियों, दोनों को नई भाषा में पढ़ने-पढ़ाने की प्रक्रिया के साथ खुद को ढालना पड़ा। कॉलेज में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो गया।

इस तरह उनकी शिक्षा तीन भाषाओं के बीच आगे बढ़ी। पहले पंजाबी में विचार करना, फिर हिंदी में उन्हें व्यवस्थित करना और अंत में अंग्रेजी में लिखना उनकी पढ़ाई का हिस्सा बन गया। परीक्षा का समय हालांकि तीन घंटे ही रहता था।
उनके पिता सेना में सैनिक से नायब सूबेदार के पद तक पहुंचे और उर्दू के दैनिक समाचार पत्र हिंद समाचार का नियमित अध्ययन करते थे। उनकी मां संस्कृत के ग्रंथों का पाठ करती थीं। इस वातावरण ने राजेश खुल्लर को विभिन्न भाषाओं और उनकी साहित्यिक परंपराओं से परिचित कराया।
पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू की भाषाई दुनिया के साथ संस्कृत के अध्ययन का पारिवारिक वातावरण उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। यह अनुभव उनके लिए केवल भाषा सीखने तक सीमित नहीं था, बल्कि अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का माध्यम भी बना।

गरीबी ने सिखाया संघर्ष और जिम्मेदारी का अर्थ
राजेश खुल्लर ने अपने बचपन में आर्थिक कठिनाइयों को करीब से देखा। परिवार की परिस्थितियों ने उन्हें कम उम्र में ही जिम्मेदारी का महत्व समझा दिया था। उनकी कोई बहन नहीं थी, इसलिए वह मां के घरेलू कामों में हाथ बंटाते थे। इस अनुभव ने उनके भीतर संवेदनशीलता और दूसरों की परिस्थितियों को समझने की भावना विकसित की।

मार्च 1977 में, जब उनकी उम्र लगभग 13 वर्ष थी और उन्होंने अभी मैट्रिक की परीक्षा भी नहीं दी थी, तब उन्होंने अपने ही हाई स्कूल के प्राथमिक विभाग में तीन महीने तक गणित पढ़ाया। इसके लिए उन्हें 250 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। यह उनके जीवन का एक ऐसा अनुभव था, जिसने कम उम्र में ही उन्हें श्रम, आत्मनिर्भरता और शिक्षा के महत्व से परिचित कराया।

राजेश खुल्लर इस अनुभव को हरियाणा की विकास यात्रा से भी जोड़कर देखते हैं। जिस तरह उन्होंने कम उम्र में जिम्मेदारी संभाली, उसी तरह प्रदेश ने भी सीमित संसाधनों के बावजूद आगे बढ़ने का प्रयास किया। बाद में लड़कियों के हाई स्कूल और कॉलेज में अध्यापन के दौरान उन्हें युवाओं की आकांक्षाओं, संघर्ष और कुछ बनने की बेचैनी को समझने का अवसर मिला।

रेलवे से IPS और IAS तक का सफर
अध्यापन के बाद राजेश खुल्लर का करियर रेलवे, भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और अंततः भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तक पहुंचा। हरियाणा कैडर में प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्होंने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। रेवाड़ी जिले के कोसली में उपमंडल मजिस्ट्रेट के रूप में उनकी शुरुआती फील्ड पोस्टिंग रही। इसके लगभग एक दशक बाद वह रोहतक के उपायुक्त बने। इन पदों पर काम करते हुए उन्होंने गांवों और शहरों में विकास की वास्तविक जरूरतों को नजदीक से देखा।

उनके लिए प्रशासन का अर्थ केवल फाइलों पर निर्णय लेना नहीं था। इसका वास्तविक उद्देश्य लोगों की समस्याओं को सुलझाना, कठिनाइयों को कम करना और विकास योजनाओं को जमीन पर उतारना था। स्थानीय लोगों के साथ संवाद स्थापित करना और उनकी भाषा तथा परिस्थितियों को समझना भी उनके काम का अहम हिस्सा रहा।
बाद में राज्य मुख्यालय में काम करते हुए उन्हें प्रशासन का दूसरा पक्ष समझने का अवसर मिला। नीतियों का निर्माण, प्रस्ताव तैयार करना और फाइलों पर निर्णय लेना सरकार की कार्यप्रणाली का ऐसा हिस्सा है, जिसमें अनेक अधिकारी और कर्मचारी पर्दे के पीछे रहकर योगदान देते हैं।
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अपनी बेटी अपना धन' जैसी पहल से सामाजिक बदलाव की सोच
राजेश खुल्लर ने अपने लेख में वर्ष 1994 की योजना 'अपनी बेटी अपना धन' का उल्लेख किया है। इस योजना का उद्देश्य नवजात बालिकाओं के भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा की दिशा में पहल करना था। उनके अनुसार, ऐसी योजनाओं के पीछे सामाजिक अनुभव और व्यक्तिगत संवेदनाएं भी काम करती हैं। उनकी अपनी बड़ी बहन का जन्म उनसे पहले हुआ था, लेकिन वह कुछ ही महीनों तक जीवित रह सकी थीं। परिवार के इस अनुभव ने बालिकाओं के जीवन और उनके भविष्य के महत्व को समझने की एक निजी संवेदना भी दी।

यह उदाहरण बताता है कि प्रशासनिक नीतियां केवल आंकड़ों और सरकारी प्रक्रियाओं से नहीं बनतीं। कई बार उनके पीछे समाज को करीब से देखने वाले लोगों के अनुभव और संवेदनाएं भी होती हैं। राजेश खुल्लर ने हरियाणा के मुख्यमंत्रियों बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला के कार्यकाल में जनसंपर्क विभाग के निदेशक के रूप में भी काम किया। बाद के वर्षों में उन्हें मनोहर लाल और नायब सिंह सैनी के कार्यालयों में भी जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला।
इन अनुभवों से उन्होंने यह महत्वपूर्ण सबक सीखा कि सरकार के फैसले केवल जनहित में होने ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता को यह भरोसा भी होना चाहिए कि निर्णय पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लिए गए हैं।

बड़े शहरों की चमक और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर
फरीदाबाद और गुरुग्राम नगर निगमों में आयुक्त के रूप में चार वर्षों तक काम करने के दौरान राजेश खुल्लर ने तेजी से विकसित होते शहरी क्षेत्रों की समस्याओं को नजदीक से देखा।
शहरों के विकास की योजनाएं तैयार करते समय शीर्ष स्तर पर दिखाई देने वाली तस्वीर और सड़क पर मौजूद वास्तविक परिस्थितियों में अंतर हो सकता है। बुनियादी सुविधाएं, स्थानीय जरूरतें और नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याएं प्रशासन को लगातार जमीन से जुड़े रहने की आवश्यकता का एहसास कराती हैं।
यह अनुभव उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उनके विचारों में विकास का मूल्यांकन केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि उसका लाभ आम नागरिक तक कितना पहुंचता है।

पंजाब और हरियाणा: तुलना नहीं, सहयोग का रिश्ता
हरियाणा दिवस और पंजाब दिवस एक ही दिन मनाए जाते हैं। राजेश खुल्लर इस संबंध को दो अलग-अलग राज्यों के बीच महज प्रशासनिक विभाजन के रूप में नहीं देखते। उनके अनुसार, हरियाणा के लोगों के मन में पंजाब के प्रति बड़े भाई जैसा स्वाभाविक लगाव है।
हरियाणा ने आर्थिक विकास के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। उनके लेख में दिए गए 2025-26 के अनुमान के अनुसार, मौजूदा कीमतों पर हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय लगभग 3.96 लाख रुपये थी, जबकि पंजाब की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2.31 लाख रुपये आंकी गई थी।

हालांकि, राजेश खुल्लर का जोर आर्थिक आंकड़ों के आधार पर पंजाब से तुलना करने या अपनी उपलब्धियों पर इतराने के बजाय आपसी सहयोग पर है। उनका स्पष्ट संदेश है कि जब पंजाब कठिन दौर से गुजर रहा हो, तब हरियाणा को तुलना के आंकड़े पेश करने के बजाय मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। पंजाब ने देश की खाद्य सुरक्षा और रक्षा में अपने संसाधनों, पानी और लोगों के बलिदान से महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उसके संघर्षों और कठिन दौर को भी समझना जरूरी है।

विकास के साथ सामाजिक चुनौतियों पर भी ध्यान जरूरी
राजेश खुल्लर मानते हैं कि हरियाणा ने आर्थिक प्रगति की है, लेकिन विकास का सफर अभी अधूरा है। उन्होंने प्रदेश में लिंगानुपात, गिरते भूजल स्तर और वायु गुणवत्ता जैसी समस्याओं को लेकर चिंता व्यक्त की है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानीपत से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' राष्ट्रीय अभियान की शुरुआत की थी। राजेश खुल्लर के अनुसार, हरियाणा में लिंगानुपात में सुधार हुआ है, लेकिन इस दिशा में अभी और प्रयास करने की जरूरत है।

उनकी चिंता युवाओं को लेकर भी है। हरियाणा ने देश को बड़ी संख्या में खिलाड़ी और सैनिक दिए हैं। इसके बावजूद कुछ युवा अपराधी गिरोहों और नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि युवाओं की आकांक्षाओं, मानसिक मजबूती और भविष्य की उम्मीदों से भी जुड़ी है। उनके विचार में आर्थिक रूप से समृद्ध होना पर्याप्त नहीं है। समाज को विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना भी उतना ही जरूरी है।

योग्यता आधारित भर्ती से युवाओं में भरोसा
राजेश खुल्लर ने अपने जीवन के एक अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने फॉरेस्ट रेंजर के पद की लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन साक्षात्कार में चयन नहीं हो सका। उस समय उन्हें भारतीय वन सेवा की तैयारी करने की सलाह दी गई थी।
उन्होंने इस अनुभव को युवाओं के लिए अवसरों और भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता के महत्व से जोड़ा। उनके अनुसार, लंबे समय तक सरकारी नौकरी पाने के लिए सिफारिश या पहुंच की जरूरत होने की धारणा ने युवाओं के भरोसे को प्रभावित किया।

वर्ष 2015 के बाद योग्यता आधारित भर्ती पर जोर दिए जाने से इस भरोसे को बहाल करने में मदद मिली है। उनकी दृष्टि में युवाओं को यह विश्वास होना चाहिए कि मेहनत, प्रतिभा और योग्यता के आधार पर वे अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

हरियाणा के युवाओं को मजबूत मन और संवेदनशील समाज की जरूरत
राजेश खुल्लर हरियाणा के भविष्य को लेकर ऐसी आकांक्षा रखते हैं, जिसमें प्रदेश अपनी संघर्षपूर्ण यात्रा को कभी न भूले। उनका मानना है कि कभी कमजोर और पिछड़ा समझा जाने वाला हरियाणा आज जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसके पीछे कठिन परिश्रम और चुनौतियों से लड़ने की क्षमता रही है।

अब जरूरत है कि प्रदेश अपने युवाओं को उसी गंभीरता से संभाले, जिस गंभीरता से वह आर्थिक विकास और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर काम कर रहा है।
कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए वह युवाओं के भीतर मन और हृदय की स्थिरता विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। उनके विचार में युवाओं को बेहतर अवसरों के साथ मानसिक मजबूती, सही दिशा और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध भी मिलना चाहिए।

इसी सोच के साथ वह विद्यार्थियों से जुड़े कार्यों के लिए 'प्राण' (PRAAN) नामक फाउंडेशन पर काम करने की इच्छा जताते हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के साथ शुरुआत करते हुए सीखने और सिखाने की ऐसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी दोनों मिलकर नई समझ विकसित करें।

1 नवंबर 1966 की लकीर से आज तक की पहचान
राजेश खुल्लर का सार्वजनिक जीवन हरियाणा के गठन के साथ शुरू हुई पहचान की कहानी को एक व्यापक प्रशासनिक अनुभव से जोड़ता है। अपने करियर में उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं और वर्ष 2020 से 2023 के दौरान विश्व बैंक के बोर्ड में भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान का प्रतिनिधित्व भी किया।
उनकी जीवन यात्रा का केंद्रीय भाव यही है कि पहचान केवल जन्म से नहीं बनती, बल्कि उसे हर दिन अपने कर्मों और निर्णयों से भी चुनना पड़ता है।

एक नवंबर 1966 को उनके माता-पिता ने जनगणना के दौरान हिंदी को मातृभाषा दर्ज कराकर जिस नवगठित राज्य के साथ जुड़ने का फैसला किया था, वह उनके लिए समय के साथ घर, समाज और कर्मभूमि की पहचान बन गया।

हरियाणा दिवस पर राजेश खुल्लर की यह कहानी प्रदेश के छह दशक के सफर को देखने का एक अलग नजरिया देती है। इसमें आर्थिक विकास की उपलब्धियां हैं, प्रशासनिक अनुभव हैं, सामाजिक चुनौतियों को लेकर चिंता है और भविष्य के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है—हरियाणा को आगे बढ़ना है, लेकिन अपनी जड़ों, संवेदनशीलता और युवाओं के प्रति जिम्मेदारी को कभी नहीं भूलना है।

 

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Content Editor

Krishan Rana

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