NCR की कैंची चलेगी या विकास को मिलेगी आजादी, 16 जून पर टिकी निगाहें

punjabkesari.in Thursday, Jun 11, 2026 - 06:44 PM (IST)

चंडीगढ़ (चंद्र शेखर धरणी) : नई दिल्ली और चंडीगढ़ के बीच 16 जून को होने वाली एक बैठक हरियाणा के विकास मॉडल को नई दिशा दे सकती है। पहली नजर में यह मामला केवल एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) की सीमाओं के पुनर्निर्धारण का लगता है, लेकिन इसके प्रभाव जमीन, उद्योग, निवेश, रोजगार और भविष्य की सरकारी नीतियों तक पहुंच सकते हैं। सवाल यह नहीं है कि कौन-सा जिला एनसीआर में रहेगा और कौन बाहर होगा, बल्कि यह है कि हरियाणा आने वाले वर्षों में विकास का रास्ता दिल्ली के सहारे तय करेगा या अपनी अलग पहचान बनाएगा।

एनसीआर का दर्जा: वरदान या विकास की बेड़ी?

पिछले दो दशकों में एनसीआर टैग को विकास की गारंटी माना गया। जिस जिले के नाम के साथ एनसीआर जुड़ा, वहां जमीन की कीमतें बढ़ीं, रियल एस्टेट कंपनियां पहुंचीं और निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी। लेकिन समय के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या दिल्ली से 150-200 किलोमीटर दूर बैठे जिलों पर भी वही नियम लागू होने चाहिए जो राजधानी के आसपास के इलाकों पर लागू होते हैं?

हरियाणा सरकार का मानना है कि कई दूरस्थ जिलों को एनसीआर के नाम पर उन पर्यावरणीय और प्रशासनिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, जिनका स्थानीय परिस्थितियों से सीधा संबंध नहीं है। उद्योगों की स्थापना, निर्माण गतिविधियों और विकास परियोजनाओं पर इसका असर पड़ता है।

अब बदल सकती है पूरी तस्वीर

रीजनल प्लान-2041 के तहत प्रस्ताव है कि एनसीआर की सीमा दिल्ली के राजघाट से 100 किलोमीटर के दायरे तक सीमित की जाए। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो हरियाणा का एनसीआर क्षेत्र लगभग आधे से भी कम रह जाएगा।
इसका मतलब होगा कि अब एनसीआर की पहचान भौगोलिक वास्तविकता के आधार पर तय होगी, न कि केवल पुराने प्रशासनिक ढांचे के अनुसार। इससे कई जिले या उनके बड़े हिस्से एनसीआर के दायरे से बाहर निकल सकते हैं।

सबसे बड़ी चिंता इन जिलों की

महेंद्रगढ़, भिवानी, चरखी दादरी, जींद और करनाल जैसे जिले इस बदलाव से सबसे अधिक प्रभावित माने जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में वर्षों से एनसीआर टैग के आधार पर विकास और निवेश की उम्मीदें जुड़ी रही हैं।यदि ये इलाके एनसीआर से बाहर होते हैं तो स्थानीय लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निवेश की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी और जमीनों की कीमतों पर असर पड़ेगा।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।हर बदलाव केवल नुकसान नहीं लाता। एनसीआर से बाहर होने का अर्थ यह भी हो सकता है कि संबंधित जिलों को अपनी जरूरतों के अनुरूप विकास योजनाएं बनाने की अधिक स्वतंत्रता मिले।

दिल्ली-केंद्रित नियमों और प्रतिबंधों से राहत मिलने पर उद्योग, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और कृषि आधारित प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। राज्य सरकार स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नीतियां तैयार कर सकेगी, जिससे विकास का मॉडल अधिक व्यावहारिक बन सकता है।

हरियाणा का अलग रुख क्यों महत्वपूर्ण है?

दिलचस्प बात यह है कि जहां उत्तर प्रदेश और राजस्थान सीमावर्ती क्षेत्रों को भी एनसीआर में बनाए रखने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं, वहीं हरियाणा अपेक्षाकृत स्पष्ट और सख्त रुख अपनाए हुए है। राज्य का मानना है कि केवल वही क्षेत्र एनसीआर में रहें जिनका दिल्ली से वास्तविक और प्रत्यक्ष आर्थिक संबंध है। यह सोच संकेत देती है कि हरियाणा अब केवल एनसीआर पहचान पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय विकास की नई रणनीति पर काम करना चाहता है।

हाईवे बन सकते हैं नई जीवनरेखा

संभावित प्रभावों को संतुलित करने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों के दोनों ओर एक-एक किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर को एनसीआर में बनाए रखने का सुझाव दिया है। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो औद्योगिक गतिविधियों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बड़ा सहारा मिल सकता है। खासकर पानीपत, करनाल और प्रमुख हाईवे बेल्ट वाले क्षेत्रों को इसका लाभ मिल सकता है।

16 जून: सिर्फ बैठक नहीं, विकास की दिशा तय करने वाला दिन

16 जून की बैठक केवल प्रशासनिक सीमाओं का मामला नहीं है। यह तय करेगी कि हरियाणा का विकास भविष्य में दिल्ली की परिधि में रहेगा या अपनी स्वतंत्र आर्थिक पहचान के साथ आगे बढ़ेगा। कुछ जिलों के लिए यह एनसीआर टैग खोने की चिंता हो सकती है, लेकिन राज्य सरकार इसे विकास की नई आजादी के रूप में देख रही है। अब सबकी नजर एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के फैसले पर है, क्योंकि यह निर्णय आने वाले दशकों के लिए हरियाणा के निवेश, शहरीकरण और आर्थिक विकास का नया नक्शा तैयार कर सकता है। 
 


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Harman

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