क्यों भारत की जल सुरक्षा रणनीति का आधार चक्रीयता होना चाहिए : यशोवर्धन अग्रवाल

punjabkesari.in Friday, Feb 27, 2026 - 07:40 PM (IST)

गुड़गांव ब्यूरो : इतिहास अक्सर विरोधाभास गढ़ता है। दुनिया के उन्नीस देशों में एक भी स्थायी नदी नहीं है, फिर भी वे भारत से अधिक जल सुरक्षित हैं। यह स्पष्ट करता है कि जल सुरक्षा विरासत में नहीं मिलती, उसे गढ़ना पड़ता है। भारत के पास नदियाँ हैं, भरपूर मानसून है और जल प्रबंधन की समृद्ध सभ्यता भी है। फिर भी नीति आयोग के 2019 के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार लगभग 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल तनाव झेल रहे हैं। स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि भारत केवल 28 प्रतिशत अपशिष्ट जल का रीसायकल करता है। 2030 तक जल मांग दोगुनी होने की आशंका है। चुनौती पानी की कमी नहीं, बल्कि प्रणाली की खामी है। हमें प्रचुरता और भरोसे के बीच की दूरी कम करनी होगी, क्योंकि यही स्वच्छता, प्रतिरोधक्षमता और प्रतिस्पर्धा तय करती है।

 

*दुनिया से सीख

यशोवर्धन अग्रवाल, निदेशक सिंटेक्स और एमडी वेलस्पन बीएपीएल ने कहा  जिन क्षेत्रों में पानी की कमी सबसे अधिक है, उन्होंने कृत्रिम जल तंत्र विकसित किए हैं। खाड़ी देशों ने 'डिसैलिनेशन' (Desalination) और व्यापक रीसाइक्लिंग को अलग 'पोटेबल' और 'नॉन-पोटेबल' नेटवर्क के साथ जोड़ा है। सिंगापुर का न्यूवॉटर उन्नत मेम्ब्रेन, 'UV प्यूरिफिकेशन' और रीयल टाइम निगरानी से भरोसा और स्थिरता बनाता है। नामीबिया का विंडहोक दशकों से बहु स्तरीय शोधन और स्वतंत्र निगरानी के साथ सुरक्षित पेय पुनर्चक्रण अपनाता है। इन उदाहरणों से तीन बातें स्पष्ट होती हैं। पुनर्चक्रित जल सुरक्षित और विस्तार योग्य है। तकनीक के साथ सशक्त शासन और निगरानी अनिवार्य हैं। आवश्यकता से अधिक शोधन महंगा और अनुपयोगी है। भारत को पुनर्चक्रण को प्राथमिकता देनी चाहिए, विलवणीकरण को चयनित रूप से अपनाना चाहिए और उपयोग के अनुसार जल गुणवत्ता तय करनी चाहिए।

 

*अपनी विरासत को फिर से पहचानें*

हमारे पूर्वज यह समझते थे। धोलावीरा के जलाशय, चोल और पांड्य काल के टैंक, गुजरात की बावड़ियां, बिहार की आहर पाइन प्रणाली और तेलंगाना की काकतीय संरचनाएं एक ही सिद्धांत पर टिकी थीं। पानी की गति धीमी करो, भंडारण बढ़ाओ, गुरुत्वाकर्षण का उपयोग करो और समुदाय को संरक्षक बनाओ। अब इस सांस्कृतिक सम्मान को आधुनिक विज्ञान और पैमाने से जोड़ने का समय है।

 

*परिपत्र भविष्य के स्तंभ*

भारत अपनी विरासत और आधुनिक इंजीनियरिंग को मिलाकर नई रूपरेखा बना सकता है। छह कदम इस बदलाव को दिशा दे सकते हैं।

पहला, महत्वाकांक्षी पुनर्चक्रण लक्ष्य तय करें। 2030 तक बड़े शहरों में 70 प्रतिशत और औद्योगिक क्लस्टरों में 90 प्रतिशत जल आवश्यकता पुनर्चक्रित स्रोतों से पूरी हो। अग्रणी संस्थानों को जल क्रेडिट प्रणाली से प्रोत्साहन दें, जैसा नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में हुआ।

दूसरा, अलग पुनर्चक्रित जल नेटवर्क बनाएं। समर्पित पाइपलाइन कूलिंग टावर, निर्माण, फ्लशिंग और पार्कों के लिए जल पहुंचाएं। लाइव निगरानी से स्वच्छता पारदर्शी और भरोसेमंद बने।

तीसरा, उद्योगों को 'वाटर-न्यूट्रल' (Water-Neutral) बनाएं। हर कारखाना अपनी पूरी जल आवश्यकता पुनर्चक्रण या वर्षा जल से पूरी करे। मॉड्यूलर शोधन संयंत्र और क्लोज्ड लूप प्रणाली को वास्तविक पुनर्चक्रित मात्रा से जोड़कर वित्त दें।

चौथा, भूजल पुनर्भरण को आधुनिक सत्यापन से जोड़ें। शोधित जल से एक्विफर और टैंकों को पुनर्जीवित करें। उपग्रह, सेंसर और डिजिटल मॉडल से निगरानी करें। परंपरा और तकनीक साथ चलें।

पांचवां, कृषि को भूजल स्वास्थ्य से जोड़ें। तनावग्रस्त क्षेत्रों में खरीद नीति और फसल बीमा कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दें। माइक्रो-इरिगेशन (Micro-irrigation) को अनिवार्य बनाया जाए और बिजली की मूल्य-नीति जिम्मेदार दोहन तय करे। 

छठा, भरोसे को आधारभूत संरचना का हिस्सा बनाएं। लोग पुनर्चक्रित जल तभी अपनाएंगे जब वे उसकी सुरक्षा पर विश्वास करेंगे। स्वतंत्र प्रयोगशालाएं, सार्वजनिक डैशबोर्ड और क्यूआर कोड (QR-code) युक्त नल गुणवत्ता को पारदर्शी बनाएं।

ऊर्जा की मांग, वितरण की जटिलता और सामाजिक स्वीकार्यता चुनौतियां हैं। समाधान भी उपलब्ध हैं। नवीकरणीय ऊर्जा शोधन संयंत्र चला सकती है। वित्तीय नवाचार इस परिवर्तन को गति देगा। म्युनिसिपल बॉन्ड, रीसाइक्लिंग-आधारित इंसेंटिव्स, GST रेशनलाइजेशन और 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (VGF) के जरिए बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित किया जा सकता है। 

2035 तक तीन लक्ष्यों की सफलता तय करें। हर महानगर अपनी गैर पेय आवश्यकता पुनर्चक्रित जल से पूरी करे। हर नया कारखाना अतिरिक्त ताजा जल पर निर्भर न रहे। हर तनावग्रस्त एक्विफर में पांच वर्ष का सुधार रुझान दिखे।

जिन देशों के पास नदियां नहीं हैं, वे बताते हैं कि सुरक्षा एक विकल्प है। हमारे पूर्वज याद दिलाते हैं कि जल सुरक्षा कभी संस्कृति थी। आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें हर लीटर को प्रवाह नहीं, संसाधन मानना होगा। यह केवल जल नीति नहीं, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है, बूंद दर बूंद।


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Content Editor

Gaurav Tiwari

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