हिमोफीलिया के लिए प्रोफिलैक्सिस को इलाज का मानक क्यों माना जाना चाहिए : डॉ. आर.पी.एस. सिबिया
punjabkesari.in Thursday, Apr 23, 2026 - 04:39 PM (IST)
गुड़गांव ब्यूरो : भारत में हीमोफीलिया एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, लेकिन अक्सर इसकी सही गिनती नहीं हो पाती। 2024 में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, हर 100,000 लोगों में लगभग 0.9 लोगों में यह बीमारी पाई जाती है, और देश में हीमोफीलिया A और B के साथ रहने वाले लोगों की संख्या 70,000 से अधिक हो सकती है। अनुमानित और वास्तव में पहचाने गए मामलों के बीच का यह अंतर दिखाता है कि खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में, जहाँ जागरूकता और इलाज की सुविधा कम है, वहाँ कई मरीजों की पहचान नहीं हो पाती और उनका सही रिकॉर्ड भी नहीं बन पाता। डॉ. आर. पी.एस. सिबिया, प्रोफेसर और मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड और डायरेक्टर प्रिंसिपल, राजिंदरा मेडिकल कॉलेज पटियाला पंजाब, के अनुसार हीमोफीलिया को अक्सर केवल “आसानी से खून बहने वाली” बीमारी समझ लिया जाता है, लेकिन असली समस्या यह है कि बार-बार खून बहने की घटनाओं का समय के साथ शरीर पर क्या असर पड़ता है। जब बार-बार खून बहता है, खासकर जोड़ों में, तो यह धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुँचाता है। समय के साथ यह लंबे समय तक रहने वाला दर्द, जकड़न, चलने-फिरने में कमी और कई मामलों में स्थायी विकलांगता का कारण बन सकता है। भारत में कई वयस्क मरीज आज भी जोड़ों की विकृति के साथ जी रहे हैं, जिसे समय पर और नियमित देखभाल से रोका जा सकता था। शोध से यह साफ हो चुका है कि हीमोफीलिया में जोड़ों की समस्या बार-बार होने वाले रक्तस्राव का लंबे समय तक रहने वाला परिणाम है। इसलिए केवल खून बहने का इंतज़ार करना और फिर उसका इलाज करना लंबे समय के लिए सही तरीका नहीं है।
यहीं पर प्रोफिलैक्सिस पूरी स्थिति को बदल देता है। प्रोफिलैक्सिस का मतलब है कि खून बहने से पहले ही नियमित रूप से क्लॉटिंग फैक्टर दिया जाए, ताकि क्षति होने के बाद इलाज करने की बजाय पहले ही खून बहने को रोका जा सके। यह तरीका इलाज के बजाय रोकथाम पर ध्यान देता है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ हीमोफीलिया के दिशानिर्देशों के अनुसार, गंभीर हीमोफीलिया वाले मरीजों के लिए प्रोफिलैक्सिस को देखभाल का सामान्य तरीका माना जाता है, और कुछ मध्यम स्तर के मामलों में भी इसकी सलाह दी जाती है। वे यह भी बताते हैं कि केवल जरूरत पड़ने पर दिया जाने वाला “ऑन-डिमांड” इलाज बीमारी के स्वाभाविक असर को नहीं बदलता, इसलिए लंबे समय तक उसी पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है। प्रोफिलैक्सिस के फायदे समझना मुश्किल नहीं है। कम खून बहने का मतलब है स्वस्थ जोड़ों, कम दर्द और ज्यादा स्वतंत्रता। प्रोफिलैक्सिस लेने वाले बच्चे अधिक नियमित रूप से स्कूल जा पाते हैं, खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं और आगे चलकर उनका रोज़मर्रा का कामकाज बेहतर रहता है। पूर्वी भारत में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि सप्ताह में एक बार दिए जाने वाले बहुत कम डोज़ वाले प्रोफिलैक्सिस से भी खून बहने की घटनाओं, अस्पताल जाने की जरूरत और स्कूल से अनुपस्थिति में काफी कमी आई। साथ ही, “ऑन-डिमांड” इलाज की तुलना में जीवन की कुल गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब घर पर इलाज करने की सुविधा तेजी से बढ़ रही है। जब मरीज या उनके देखभाल करने वाले लोगों को घर पर ही इलाज देने की ट्रेनिंग मिलती है, तो समय पर इलाज हो पाता है और इलाज को नियमित रूप से जारी रखना भी आसान हो जाता है। इससे बार-बार अस्पताल जाने की जरूरत कम हो जाती है, जो कई परिवारों के लिए मुश्किल होती है। समय के साथ यह तरीका इलाज को अधिक नियमित और प्रभावी बनाने में मदद करता है। इसलिए प्रोफिलैक्सिस को कुछ लोगों के लिए ही उपलब्ध कोई खास या महंगा इलाज नहीं माना जाना चाहिए। खासकर बच्चों और गंभीर हीमोफीलिया से पीड़ित लोगों के लिए इसे देखभाल का सामान्य तरीका माना जाना चाहिए। हमेशा लक्ष्य यह होना चाहिए कि जोड़ों को नुकसान होने से पहले ही उसे रोका जाए, न कि बाद में होने वाली समस्याओं को संभाला जाए। भारत जैसे देश में, जहाँ बीमारी का बोझ ज्यादा है और अक्सर समय पर पहचान नहीं हो पाती, वहाँ रोकथाम केवल बेहतर इलाज ही नहीं, बल्कि एक ज्यादा व्यावहारिक और मानवीय तरीका भी है।