हरियाणा का ऐसा गांव जहां 4 दिन तक खेल जाती है होली, बैजलपुर की ‘कोरड़ा होली’ की है खास पहचान

punjabkesari.in Wednesday, Mar 04, 2026 - 05:48 PM (IST)

फतेहाबाद(रमेश): जिले के गांव बैजलपुर में यह पर्व सामाजिक सौहार्द और परंपरा के संरक्षण का अनोखा संदेश देता है। होली के रंग जहां देशभर में मस्ती और उमंग के प्रतीक हैं, वहीं जिले के गांव बैजलपुर में यह पर्व सामाजिक सौहार्द और परंपरा के संरक्षण का अनोखा संदेश देता है। पिछले 22 वर्षों से यहां दुलहंडी पर मनाई जा रही ‘कोरड़ा होली’ अब केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि गांव की पहचान बन चुकी है।

पूरा गांव ने एक स्थान पर एकत्र होकर होली खेलने की परंपरा अपनाई। धीरे-धीरे यह आयोजन ‘कोरड़ा होली’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया और आज यह आसपास के गांवों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

4 से 6 मार्च तक चलने वाले इस तीन दिवसीय फाग उत्सव में 20 साल के युवाओं से लेकर 70 वर्ष तक के बुजुर्ग देवर-भाभी जोश के साथ हिस्सा लेते हैं। गांव के मुख्य चौक में जैसे ही ढोल की थाप और फाग के पारंपरिक गीत गूंजते हैं, पूरा माहौल रंगों से नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट से सराबोर हो उठता है।

कढ़ाई का पानी और रस्सी के कोरड़े
इस अनोखी होली की सबसे खास बात है इसकी शैली। गांव के चौक में लोहे की बड़ी कढ़ाई पानी से भरकर रखी जाती है। पास में टैंकरों में भी पानी की व्यवस्था रहती है। एक ओर महिलाएं चुन्नी, कपड़ों और मजबूत रस्सियों से बने कोरड़ों के साथ खड़ी रहती हैं, तो दूसरी ओर रिश्ते में देवर लगने वाले युवा तैयार रहते हैं। महिलाएं हंसी-ठिठोली के बीच कोरड़ों से वार करती हैं और युवक कढ़ाई से पानी भरकर उन पर डालते हैं।

यह दृश्य देखने लायक होता है। चारों ओर फाग के गीत, तालियां और ठहाके गूंजते हैं। खास बात यह है कि पूरा आयोजन मर्यादा और सम्मान की सीमा में रहता है। ग्रामीण परिवेश में देवर-भाभी का रिश्ता हमेशा हंसी-मजाक और अपनत्व से जुड़ा रहा है। ‘कोरड़ा होली’ इसी रिश्ते की सजीव झलक पेश करती है, जहां कोरड़ों की मार भी स्नेह का प्रतीक बन जाती है और युवा इसे खुशी-खुशी सहते हैं।
 


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Content Writer

Isha

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