सड़क हादसे में 19 वर्षीय युवक की मौत, अदालत ने इंश्योरेंस कंपनी को दिए 18 लाख मुआवजा देने के आदेश
punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 09:20 PM (IST)
गुड़गांव, (ब्यूरो): मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) गुरुग्राम के पीठासीन अधिकारी निशांत की अदालत ने 19 वर्षीय युवक वीरेंद्र की सड़क हादसे में हुई मौत के मामले में उसके माता-पिता को 18 लाख 14 हजार 400 रुपये का मुआवजा देने का फैसला सुनाया है। अदालत ने यह मुआवजा राशि 7.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित अदा करने का आदेश बीमा कंपनी को दिया है।
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जानकारी के अनुसार हादसा 26 मई 2024 की शाम करीब पौने छह बजे दिल्ली-जयपुर हाईवे पर पॉलीटेक्निक कॉलेज के आगे फौजी कैंप के पास हुआ था। जयपुर जिले के कोटपुतली निवासी 19 वर्षीय वीरेंद्र अपने साथी गजेंद्र के साथ बाइक से गुरुग्राम के सेक्टर-39 से अपने गांव नारायणपुर जा रहा था। बाइक वीरेंद्र चला रहा था और गजेंद्र पीछे बैठा था। हाईवे पर आगे चल रहे कैंटर के चालक ने अचानक बिना कोई सिग्नल दिए ब्रेक लगा दिए। अचानक ब्रेक लगने के कारण वीरेंद्र की बाइक कैंटर के पीछे जा टकराई। हादसे में वीरेंद्र को गंभीर चोटें आईं और अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया, जबकि पीछे बैठा गजेंद्र गंभीर रूप से घायल हो गया। मामले में थाना मानेसर में कैंटर चालक के खिलाफ लापरवाही से वाहन चलाने की एफआईआर दर्ज की गई थी।
मृतक वीरेंद्र के पिता पूरण मल और मां कृष्णा ने अदालत में 1.30 करोड़ रुपये के मुआवजे की याचिका दायर की थी। उन्होंने बताया कि उनका बेटा जेप्टो कंपनी में काम करता था और वही परिवार का मुख्य सहारा था। सुनवाई के दौरान कैंटर मालिक और बीमा कंपनी ने याचिका का विरोध किया और बाइक सवार पर ही तेज गति व लापरवाही का आरोप लगाया। अदालत ने गवाहों और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद माना कि हाईवे पर बिना इशारा किए अचानक ब्रेक लगाना कैंटर चालक की लापरवाही थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए अदालत ने यह भी माना कि आगे चल रहे वाहन से उचित दूरी न बनाए रखने के कारण बाइक सवार वीरेंद्र की भी 20 प्रतिशत अंशदायी लापरवाही थी।
अदालत ने मृतक की आय, आयु और भविष्य की संभावनाओं का आकलन करते हुए कुल क्षतिपूर्ति 22,68,000 रुपये निर्धारित की। इसमें 20 प्रतिशत की अंशदायी कटौती के बाद शुद्ध मुआवजा राशि 18 लाख 14 हजार 400 रुपये तय की गई, जिसे माता-पिता में बराबर 50-50 प्रतिशत बांटा जाएगा। अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह याचिका दायर करने की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ यह राशि सीधे दावेदारों के बैंक खाते में जमा कराए।