नई शिक्षा नीति से बनेंगे सक्षम नौजवान और अंग्रेजियत की कुण्ठा का भी होगा अन्त: प्रो. कुठियाला

7/31/2020 11:44:44 PM

चंडीगढ़ (धरणी): हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि परिषद का बहुत महत्वपूर्ण कार्य ‘सक्षम स्नातक’ अभियान के अन्तर्गत हुआ है। पाँच सौ से अधिक प्राध्यापकों के योगदान से 21 विषयों में जीविका उपार्जन के 10-10 प्रैक्टिकल बनाए हैं। हर विद्यार्थी तीन वर्ष की स्नातक शिक्षा अवधि में 40 जीविका उपार्जन के प्रैक्टिकल तीन-तीन बार करेगा। इन 40 प्रयोगों में से किसी एक को रुचि के अनुसार आधार बनाकर स्वतंत्र रूप से अपना व्यवसाय करके अपना व परिवार का पालन पोषण कर सकता है। परिषद ने हरियाणा में 119 नए व रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को भी अनुमोदित किया है। पुराने पाठ्यक्रमों का भी आधुनिकीकरण करवाया गया है। ‘परीक्षा आन डिमांड’ का भी प्रयोग आंशिक रूप में कुछ विश्वविद्यालयों में हो रहा है। 

पंजाब केसरी से एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने बताया कि सम्पूर्ण विश्व आज यह मानता है कि भारतवर्ष में अति उन्नत सभ्यता हजारों वर्ष पहले पनपी है। उस समय भारतीयों ने प्रकृति के ज्ञान-विज्ञान को भी समग्रता से समझा था और ग्रंथों में संजोया भी था। उस समय का जीवन भी अत्यन्त श्रेष्ठ था। समानता व समरसता थी, सम्पन्नता थी व हर्ष और आनन्द था। उस समय की जीवन शैली व ज्ञान-विज्ञान को जानना आज विश्व के लिए लाभकारी है। इस दिशा में पूरी दुनिया में अनेक प्रयास हो रहे हैं। परिषद ने हर निजी व राज्य पोषित विश्वविद्यालय को भारतीय ज्ञान परम्परा में से किसी एक विषय पर विशेषज्ञता प्राप्त करने का आग्रह किया है। इस प्रकार भारतीय ज्ञान को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विश्व के सम्मुख रखने का महत्वपूर्ण कार्य प्रगति पर है। 

प्रस्तुत है एक्सक्ल्युसिव इंटरव्यू के प्रमुख अंश-

प्रश्न- आपको हरियाणा उच्चतर शिक्षा परिषद के अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है। इस परिषद का उद्देश्य और भूमिका क्या है?
उत्तर- राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान के नियमों के अनुसार हर राज्य में उच्च शिक्षा परिषद के गठन की अनिवार्यता है। हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद विधानसभा से पारित अधिनियम द्वारा गठित हुई है। परिषद का उद्देश्य उच्च शिक्षा का प्रबन्धन शैक्षणिक व बौद्धिक दृष्टि से करने का है। शिक्षा की प्रकृति भिन्न है, इसे सामान्य प्रशासनिक और कानून व्यवस्था की परम्पराओं के आधार पर चलाना घातक है। 

प्रश्न- परिषद ने उच्च शिक्षा में आपके कार्यकाल की शुरुआत में क्या बदलाव किए?
उत्तर- पहली चुनौती तो प्रशासन में परिषद की स्वीकार्यता की थी। परिषद किसी व्यवस्था का विकल्प नहीं है, परन्तु इसकी भूमिका राज्य में शैक्षणिक वातावरण को विद्यार्थी के हित में बनाना है। ऐसा पाया गया कि राज्य के उच्च शिक्षा जगत में संवादहीनता थी। कुलपतियों का आपस में मिलना कम था। प्रशासन व उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच अविश्वास व कटुता थी, प्राध्यापक वर्ग भी अपने-अपने दायरों में रहते थे। शिक्षा क्षेत्र के दायित्व संभालने वाले राजनीतिज्ञों का शिक्षक वर्ग से संवाद सीमित था। परिषद ने पारस्परिक संवाद कराने के लिए योजना बना कर कार्य किया और विभिन्न वर्गों को आपस में बिठा कर विमर्श करवाए। आज तक 117 विमर्श हो चुके हैं जिनमें राज्यपाल, मुख्य मन्त्री, शिक्षा मंत्री, कुलपति, प्रिंसिपल, प्राध्यापक, डीन व अधिकारियों की सहभागिता रही। आज राज्य के शिक्षा जगत में लगभग हर विषय पर विमर्श से सहमति बना कर कार्य हो रहा है।

प्रश्न- अपने कार्यकाल के दो साल बाद आप किन उद्देश्यों को प्राप्त कर पाए हैं?
उत्तर- परिषद का बहुत महत्वपूर्ण कार्य ‘सक्षम स्नातक’ अभियान के अन्तर्गत हुआ है। पाँच सौ से अधिक प्राध्यापकों के योगदान से 21 विषयों में जीविका उपार्जन के 10-10 प्रैक्टिकल बनाए हैं। हर विद्यार्थी तीन वर्ष की स्नातक शिक्षा अवधी में 40 जीविका उपार्जन के प्रैक्टिकल तीन-तीन बार करेगा। इन 40 प्रयोगों में से किसी एक को रुचि के अनुसार आधार बनाकर स्वतन्त्र रूप से अपना व्यवसाय करके अपना व परिवार का पालन पोषण कर सकता है। परिषद ने हरियाणा में 119 नए व रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को भी अनुमोदित किया है। पुराने पाठ्यक्रमों का भी आधुनिकीकरण करवाया गया है। ‘परीक्षा आन डिमांड’ का भी प्रयोग आंशिक रूप में कुछ विश्वविद्यालयों में हो रहा है। 

प्रश्न- ग्रामीण और शहरी शिक्षार्थियों के मामले में हरियाणा में बहुत विविधता है। उच्च शिक्षा में सब तक पहुंच बनाने के लिए आपने सरकार को क्या सुझाव दिए?
उत्तर- हरियाणा सरकार का संकल्प है कि ग्रामीण लड़कियों-लड़कों को कॉलेज की शिक्षा के लिए बहुत दूर न जाना पड़े।  प्रयास रहेगा कि 15 किमी के घेरे में ही कालेज उपलब्ध हो। अधिक वरीयता ग्रामीण युवतियों के लिए प्रासंगिक उच्चशिक्षा प्रदान करने की है। यह भी योजना है कि ग्रामीण कालेजों में श्रेष्ठ प्राध्यापकों द्वारा शिक्षा की व्यवस्था हो।

प्रश्न- राज्य में महिलाओं की शिक्षा के लिए आपने सरकार को कौन सी नीतियां सुझाईं? 
उत्तर-
पिछले कुछ वर्षों से दो परिवर्तन हुए हैं। पहला यह कि अधिकतर कोर्सों में प्रवेश लेने में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है। दूसरा, परीक्षा परिणामों में पहले कुछ स्थान लड़कियों को ही मिलता हैं। यह हरियाणा में सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन की शुरुआत है और शिक्षा की इसमें अहम भूमिका है। महिला कॉलेजों की संख्या भी बढ़ी है और भी बढ़ाने की योजना है। 

प्रश्न- आप भारत सरकार की आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ मूल्य आधारित शिक्षा को एकीकृत करने की नीति को कैसे देखते हैं?
उत्तर- शिक्षा, जीवन मूल्य और संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं। मौलिक मानवीय मूल्यों व सकारात्मक संस्कारों के बिना जीवन में गुणवत्ता नहीं हो सकती। परिवार के बाद शिक्षा ही मूल्यों के संस्कार देने का मुख्य साधन है। सामान्य जीवन मूल्यों के साथ-साथ व्यवसायिक मूल्यों को भी युवाओं के व्यक्तित्व में समावेश करवाना आवश्यक है। कल के प्रशासक या प्रबंधक के जीवन में सेवा व आर्थिक शुचिता के प्रति संकल्पित होना आवश्यक है। कल के वकील या न्यायाधीश के व्यक्तित्व में निष्पक्षता का मूल्य डालना ही चाहिए। 

प्रश्न- वर्तमान शैक्षिक परिदृश्य में प्राचीन भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक पूंजी कैसे प्रासंगिक है?
उत्तर- सम्पूर्ण विश्व आज यह मानता है कि भारतवर्ष में अति उन्नत सभ्यता हजारों वर्ष पनपी है। उस समय भारतीयों ने प्रकृति के ज्ञान-विज्ञान को भी समग्रता से समझा था और ग्रंथों में संजोया भी था। उस समय का जीवन भी अत्यन्त श्रेष्ठ था। समानता व समरसता थी, सम्पन्नता थी व हर्ष और आनन्द था। उस समय की जीवन शैली व ज्ञान-विज्ञान को जानना आज विश्व के लिए लाभकारी है। इस दिशा में पूरी दुनिया में अनेक प्रयास हो रहे हैं। परिषद ने हर निजी व राज्य पोषित विश्वविद्यालय को भारतीय ज्ञान परम्परा में से किसी एक विषय पर विशेषज्ञता प्राप्त करने का आग्रह किया है। इस प्रकार भारतीय ज्ञान को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विश्व के सम्मुख रखने का महत्वपूर्ण कार्य प्रगति पर है। 

प्रश्न- मैकाले की उपनिवेशी शिक्षा प्रणाली से भारतीय उच्च शिक्षा कैसे बाहर आ सकती है?
उत्तर- 29 जुलाई के घोषित नई शिक्षा नीति भारत की शिक्षा पर से ब्रिटिश छाप को पूर्ण रूप से मिटाने की कार्य योजना है। भारत की शिक्षा से भारतीयता से भरपूर नागरिक ही बनने चाहिए जो अपने समाज की वास्तविकता को समझते हों। भारतीय भाषाओं में शिक्षा लेने से अधिक सक्षम नौजवान बनेंगे और अंग्रेजियत की कुण्ठा का भी अन्त होगा। 

प्रश्न- वर्तमान में कोविड-19 के कारण दुनिया पंगु हो गई थी।  छात्रों के शिक्षण के नुकसान के लिए परिषद द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानो को आप द्वारा कौन से कदम सुझाए गए?
उत्तर- परिषद ने लॉकडाउन शुरू होते ही सभी विश्वविद्यालयों व कालेजों को आनलाइन कक्षाएं लेने के लिए कहा और हमारा विद्यार्थी इससे काफी लाभान्वित भी हुआ। शिक्षकों को ऑनलाइन सिखाने व पढ़ाने की विधाओं में प्रशिक्षण भी चल रहा है। कोविड के बाद भी यह चलेगा। पाठ्यक्रमों में भी आनलाइन पढ़ाए जा सकने वाले विषयों को भी चिन्हित किया जा रहा है। हर कॉलेज व विश्वविद्यालय में ‘मोबाइल बैंक’ बनाने के लिए कहा गया है जहां से उन विद्यार्थियों को स्मार्ट फोन दिया जाएगा जो खरीदने में असमर्थ हैं। इसी तरह डैटा देने के भी उपाय किए जा रहे हैं। 

प्रश्न- पोस्ट कोविड समय में शिक्षा की विषय-वस्तु और वितरण में आप क्या बदलाव देखते हैं? 
उत्तर- ऑनलाइन सीखना व सिखाना शिक्षा का अभिन्न अंग हो गया है और यह भविष्य में और बढ़ेगा। मिश्रित व्यवस्था चलेगी जिसे ‘फिजीटल’ नाम दिया है अर्थात् प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन (फिजिकल+डिजिटल) दोनों का प्रयोग। परिषद के आग्रह पर हरियाणा में उच्चशिक्षा के सभी पाठ्यक्रमों का पुनर्निर्माण प्रारम्भ हो गया है, नए सत्र से पहले यह कार्य पूरा हो जाएगा। 

प्रश्न- भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति को अपनाया है। ०इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर- लाखों विमर्श हुए और देश के शीर्षस्थ क्षिक्षाविदों ने मिलकर नई शिक्षा नीति बनाई है। इसका प्रारूप एक वर्ष पूर्व  उपलब्ध करवाया गया था। परिषद ने इसका अध्ययन किया और कुछ सुझाव भी भेजे। कुलपतियों के साथ अन्य शिक्षाविदों के साथ विमर्श भी किए। प्रारूप के अनुसार अपने हरियाणा में क्या-क्या करना है- इसकी भी रूपरेखा बनाई। अब जो रिपोर्ट आई है उसका अध्ययन प्रारंभ कर दिया है शीघ्र ही सरकार के सामने कार्य योजना प्रस्तुत करेंगे। 

प्रश्न- नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के लिए आप क्या सकारात्मकता देखते हैं?
उत्तर- अनेक सकारात्मक प्रस्ताव हैं। सबसे महत्वपूर्ण है मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय रखना। देश का नागरिक खनिजों की तरह संसाधन नहीं है। मनुष्य तो संसाधनों का प्रबन्धक व भोक्ता है। यह दृष्टि दोष था जो अब दूर हो गया है। दूसरा, शिक्षा को उन विशेषज्ञों से मुक्त करने का प्रयास हैं जिनका प्रशिक्षण और अनुभव, कानून व्यवस्था को सुचारू करने का होता है। हर शिक्षण संस्थान स्वायत्त होगा। तीसरा, शिक्षा का सामान्य व टेक्रिकल का अनुचित वर्गीकरण समाप्त होगा। एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव शोध के विषय में है। कुछ कॉलेजों व विश्वविद्यालयों का मुख्य कार्य ही शोध व नवाचार का होगा। बहुत बड़े फण्ड के साथ शोध संस्थान भी केंद्रीय स्तर पर बनेगा। अफिलिएशन भी समाप्त करना एक सकारात्मक प्रस्ताव है। 

प्र्रश्न- क्या आप कोविड-19 के दौरान अनिश्चितता का सामना कर रहे युवा छात्रों को कुछ संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर- पूरा विश्व घोर अनिश्चितता के वातावरण से गुजर रहा है। चुनौती है, निराश होंगे तो हारेंगे। चुनौती को अवसर के रूप में लेना ही समझदारी है। अवसर को अपने लिए लाभकारी बनाना हर युवक को आता है। घरवास करते हुए अपने व्यक्तित्व को सँवारे, दो भाषाओं में बोलने व लिखने का अभ्यास करें। रुचि के अनुसार आनलाइन कोर्स करें। प्राणायाम, योग व ध्यान का अभ्यास करें। माता-पिता, परिवारजनों व पड़ोसियों की देखभाल करें। बहुत शीघ्र सामान्य स्थिति बनेगी उस नए युग में बहुत कुछ करने को होगा, अभी से तैयारी करेंगे तो बहुत आगे बढ़ेंगे व सपने साकार होंगे।


Shivam

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