पूर्व MLA रेलूराम परिवार हत्याकांड मामला, बेटी व दामाद को अंतरिम जमानत व समय पूर्व रिहाई के खिलाफ SC में याचिका दायर
punjabkesari.in Sunday, Jan 25, 2026 - 12:34 PM (IST)
हिसार : पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया परिवार हत्याकांड में दोषसिद्ध अभियुक्तों सोनिया और संजीव को दी गई अंतरिम जमानत एवं उनकी समय पूर्व रिहाई से संबंधित आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एस.एल.पी.) दायर की गई है। पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता लाल बहादुर खोवाल ने बताया कि रेलूराम के परिवार की तरफ से यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता की तरफ से दायर की गई है।
याचिका में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के 9 दिसम्बर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। उक्त आदेश तहत दोषसिद्ध अभियुक्तों को 2 महीने की अंतरिम जमानत दी गई थी तथा उनकी समयपूर्व रिहाई के मामले में स्टेट लैवल कमेटी को पुनर्विचार करने के निर्देश दिए गए थे। इस याचिका पर 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। याचिका मुख्य उद्देश्य है कि एक ऐसे जघन्य एवं पूर्व-नियोजित अपराध में जिसमें 24 अगस्त 2001 की रात को पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया सहित उनके परिवार के डेढ़ महीने की बच्ची समेत 8 सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। दोषसिद्ध अभियुक्तों को अंतरिम राहत देना विधि, सार्वजनिक सुरक्षा और न्याय के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। इस मामले में अभियुक्तों को दी गई मृत्युदंड की सजा को केवल दया याचिका में विलंब के आधार पर आजीवन कारावास में परिवर्तित किया गया था न कि अपराध की गंभीरता या दोषसिद्धि पर किसी संदेह के कारण।
इसमें राज्य सरकार और स्टेट लैबल कमेटी ने दोषसिद्ध अभियुक्तों के जेल आचरण, निरंतर आपराधिक प्रवृत्ति और समाज के लिए संभावित खतरे को देखते हुए उनकी समयपूर्व रिहाई को विधिवत और कारणयुक्त आदेश अस्वीकार किया था। उसके बावजूद उच्ब न्यायालय की तरफ से उस निर्णय में हस्तक्षेप कर अंतरिम जमानत देना और पुनर्विचार के निर्देश जारी करना, याचिका अनुसार न्यायिक सीमाओं का अतिक्रमण है, जिससे आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अंतरिम जमानत आदेश के बाद पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया के परिजन सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्त्ता जितेंद्र पूनिया, सतपाल पूनिया, कौशल पूनिया, कमल पूनिया और उनके अन्य को गंभीर सुरक्षा का खतरा उत्पन्न हो गया है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रकार के जघन्य अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को अस्थायी राहत देना न केवल पीड़ित पक्ष के जीवन और सुरक्षा के अधिकारों का उल्लंघन है। बल्कि समाज में कानून और न्याय के प्रति विश्वास को भी कमजोर करता है। याचिका में मांग की गई है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। ऐसे मामलों में जहां समाज की सामूहिक अंतर्रात्मा आहत हुई हो। वहां दोषसिद्ध अभियुक्तों को अंतरिम राहत देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।