खुलासा: 9 सालों में लोकायुक्त की 75 प्रतिशत सिफारिशों पर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की

3/19/2020 4:59:20 PM

चंडीगढ़ (धरणी): भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए बनाए गए लोकायुक्त के अधिकांश फैसलों को सरकार खुद ही नहीं मानती। गत नौ सालों में सरकार ने लोकायुक्त के 75 फीसदी फैसलों पर कार्रवाई ही नहीं की। 

आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर ने लोकायुक्त कार्यालय से आरटीआई में गत 26 फरवरी को प्राप्त सूचनाओं से खुलासा किया है कि 1 अप्रैल 2010 से 31 मार्च 2019 तक 9 वर्षों में लोकायुक्त द्वारा कुल 463 शिकायत केसों में कार्रवाई के लिए सरकार को सिफारिशें भेजी गई। लेकिन भ्रष्टाचार, गबन, धांधली के इन केसों में से मात्र 113 केसों में ही की गई कारवाई की रिपोर्ट सरकार ने भेजी। यानि लोकायुक्त की 75 फीसदी सिफारिशों पर कोई तवज्जो नहीं दी। इन कुल 463 सिफारिशों में से कांग्रेस शासनकाल (1 अप्रैल 2010 से 31 मार्च 2015 तक) के 5 वर्षों में सरकार को भेजी 347 सिफारिशों में से सिर्फ 37 केसों में ही सरकार ने कारवाई करके लोकायुक्त को रिपोर्ट दी। जबकि 310 केसों में यानि 89 प्रतिशत सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की। 

इसी तरह भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली भाजपा सरकार के 4 वर्ष के कार्यकाल (1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2019) में लोकायुक्त ने कुल 116 केसों की जांच के उपरांत कारवाई के लिए सरकार को समय-समय पर सिफारिशें भेजी। लेकिन खट्टर सरकार ने 76 केसों में कारवाई करके लोकायुक्त को रिपोर्ट दी, जबकि शेष 40 केसों यानि 35 प्रतिशत केसों में कार्रवाईकी रिपोर्ट सरकार को नहीं दी। लोकायुक्त एक्ट-2002 के सैक्शन 17(2) के तहत सरकार को कारवाई करके 3 महीने में सभी रिपोर्ट देनी थी।

भ्रष्टाचार के जिन केसों में सरकार ने कारवाई नहीं की उनमें करोड़ों रूपये का चर्चित अम्बाला मनरेगा घोटाला भी शामिल है। जिसमें लोकायुक्त ने 26 मई 2017 को पांच आईएएस अफसरों को भ्रष्टाचार, गबन, धांधली का दोषी पाते हुए इनके खिलाफ आपराधिक मुकद्दमा दर्ज करने की सिफारिश सरकार को की थी। लोकायुक्त की सिफारिशों पर सरकार द्वारा कोई कारवाई ना करने से भ्रष्टाचारियों की मौज हो रही है, जबकि शिकायतकर्ता निराश हैं।

वर्ष 2006 से फरवरी 2020 तक लोकायुक्त ने प्राप्त 6641 शिकायतों में से 5422 शिकायतों की जांच उपरांत निपटान कर दिया। जबकि अभी कुल 1219 शिकायत केस लोकायुक्त के समक्ष विचाराधीन हैं।

लोकायुक्त कार्यालय के वार्षिक बजट में पिछले 14 वर्षों में 8 गुणा वृद्धि हुई है। वर्ष 2006-07 में मात्र 50,85000/- रूपये का वार्षिक बजट वर्ष 2019-20 में बढ़कर 3,95,73000/- रूपये हो चुका है। हाईकोर्ट के जज के समकक्ष लोकायुक्त के मासिक वेतन भत्तों पर कुल 3,21,750/- रूपये खर्च किए जा रहे हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर ने कहा कि ये आरटीआई खुलासा प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस के दावों पर गंभीर सवाल है। लोकायुक्त के अधिकांश फैसलों पर कारवाई ना होने से भ्रष्टाचारी बेखौफ हैं। जब लोकायुक्त की सिफारिशों को लागू ही नहीं करना तो क्यों पब्लिक को धक्के खिलाए जा रहे हैं व क्यों करोड़ों रूपये की सार्वजनिक धन राशि लोकायुक्त कार्यालय पर फूंकी जा रही है।


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Shivam

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