हरियाणा की सियासत में बढ़ता ''भंडारी फैक्टर'', रणनीतिक प्रबंधन से बनाई अलग पहचान

punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 02:40 PM (IST)

चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान यदि किसी गैर-निर्वाचित राजनीतिक रणनीतिकार की सबसे अधिक चर्चा हुई है तो उनमें तरुण भंडारी प्रमुख नाम बनकर उभरे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के भरोसेमंद सहयोगी रहे भंडारी अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के भी करीबी और विश्वस्त माने जाते हैं। भाजपा के संगठनात्मक और राजनीतिक अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

पंजाब विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के पंजाब दौरों, विभिन्न धार्मिक संतों से मुलाकातों, बड़े आयोजनों तथा भाजपा के विस्तार अभियान में भी तरुण भंडारी की सक्रिय भागीदारी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रही है। पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में देखा जाता है, जो संगठन और राजनीतिक प्रबंधन दोनों पर समान पकड़ रखते हैं।

शांत स्वभाव, लेकिन मजबूत राजनीतिक पकड़

मिलनसार, व्यवहारकुशल और शांत स्वभाव के तरुण भंडारी ने अपनी कार्यशैली से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का भी विश्वास अर्जित किया है। पहले वे मनोहर लाल के पब्लिसिटी एडवाइजर के रूप में कार्य कर चुके हैं, लेकिन अब उनकी भूमिका केवल प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं मानी जाती। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वे माइक्रो मैनेजमेंट और चुनावी रणनीति के अहम चेहरों में शामिल हो चुके हैं।

राज्यसभा चुनावों में बढ़ी चर्चा

हरियाणा के पिछले दो राज्यसभा चुनावों के दौरान भी भंडारी का नाम राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आया। राजनीतिक हलकों में यह माना गया कि भाजपा की रणनीति को जमीन पर उतारने और विपक्ष के भीतर समीकरणों को समझने में उनकी सक्रिय भूमिका रही। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषणों में उनका नाम लगातार लिया जाता रहा है।

हिमाचल से हरियाणा तक चर्चा

हरियाणा से पहले हिमाचल प्रदेश के राज्यसभा चुनाव के दौरान भी तरुण भंडारी का नाम व्यापक रूप से चर्चा में रहा। कांग्रेस के भीतर हुई टूट और राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच उनका नाम सामने आया। इस प्रकरण में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई तथा एसआईटी ने पूछताछ भी की, हालांकि मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है। इसके बावजूद भाजपा समर्थक उन्हें प्रभावशाली चुनावी रणनीतिकार के रूप में देखते हैं।

किरण चौधरी ने भी किया था उल्लेख

पूर्व मंत्री किरण चौधरी जब अपनी पुत्री श्रुति चौधरी के साथ भाजपा में शामिल हुई थीं, तब उन्होंने सार्वजनिक मंच से तरुण भंडारी के योगदान का उल्लेख किया था। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा और तेज हो गई कि भाजपा में नए नेताओं को जोड़ने और राजनीतिक संवाद स्थापित करने में भंडारी की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हरियाणा के राज्यसभा चुनावों का इतिहास

हरियाणा के राज्यसभा चुनाव हमेशा राजनीतिक रणनीति, संख्या बल और क्रॉस वोटिंग की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे हैं।

2016 में सुभाष चंद्रा की जीत ने दिखाया कि चुनाव केवल संख्या से नहीं बल्कि संगठनात्मक रणनीति से भी जीते जाते हैं।

2022 में अजय माकन की हार और चर्चित "पेन-स्याही विवाद" ने पूरे देश का ध्यान हरियाणा की राजनीति की ओर खींचा।

2026 के चुनाव ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि राज्यसभा चुनावों में राजनीतिक प्रबंधन और आंतरिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

कांग्रेस के सामने आंतरिक चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के राज्यसभा चुनाव ने कांग्रेस के भीतर मौजूद असंतोष और गुटबाजी को भी उजागर किया है। यदि किसी दल के विधायकों का अपेक्षित समर्थन उसके आधिकारिक उम्मीदवार को नहीं मिलता, तो यह संगठनात्मक चुनौतियों का संकेत माना जाता है। ऐसे में कांग्रेस के सामने विपक्ष से अधिक अपनी आंतरिक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती दिखाई देती है।

निष्कर्ष

हरियाणा की राजनीति में अब चुनाव केवल जनसभाओं और प्रचार अभियानों से नहीं जीते जाते, बल्कि पर्दे के पीछे होने वाली राजनीतिक बातचीत, रणनीतिक समन्वय और संगठनात्मक प्रबंधन भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। इन्हीं कारणों से तरुण भंडारी का नाम पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसे राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में उभरकर सामने आया है, जिनकी भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चा होती रही है। हालांकि उनके प्रभाव को लेकर किए जाने वाले कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, फिर भी भाजपा के भीतर उनकी बढ़ती सक्रियता और स्वीकार्यता ने उन्हें हरियाणा की समकालीन राजनीति का चर्चित चेहरा बना दिया है।


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Content Writer

Manisha rana

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