चन्द्रशेखर धरणी के नेतृत्व में हरियाणा प्रतिनिधिमंडल ने कर्नाटक विधानसभा में देखा सत्ता, सदन व सिस्टम का पूरा तंत्र
punjabkesari.in Saturday, Mar 28, 2026 - 03:16 PM (IST)
बेंगलुरु/कर्नाटक (धरणी) : दक्षिण भारत की राजनीति के सबसे प्रभावशाली शक्ति-केंद्रों में शामिल कर्नाटक विधानसभा इन दिनों हरियाणा विधानसभा की प्रेस एडवाइजरी कमेटी (PAC) के अध्ययन का केंद्र बनी हुई है। पीएसी चेयरमैन चन्द्र शेखर धरणी के नेतृत्व में हरियाणा का प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक विधानसभा के स्टडी टूर पर पहुंचा, जहां लोकतंत्र की कार्यप्रणाली, मीडिया और सदन के रिश्ते, सत्ता संचालन की शैली और संसदीय व्यवस्थाओं का गहराई से अध्ययन किया गया।
प्रतिनिधिमंडल में योगिंद्र शर्मा, दिनेश भारद्वाज, राकेश गुप्ता, अनुराग अग्रवाल, गीतांजलि, संजीव शर्मा, अनिल गाबा, आशीष वर्मा, थानेश्वर शर्मा, हरियाणा विधानसभा के अंडर सेक्रेटरी नवीन भारद्वाज तथा मीडिया से संबंधित दिनेश भी शामिल रहे। सभी ने कर्नाटक विधानसभा, विधान परिषद, स्पीकर कार्यालय, प्रेस व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे का निकट से अवलोकन किया। यह दौरा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतंत्र को संस्थागत रूप से समझने और हरियाणा विधानसभा की मीडिया व संसदीय व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
कर्नाटक विधानसभा क्यों बनी हरियाणा पीएसी के अध्ययन का केंद्र?
कर्नाटक विधानसभा केवल एक विधान भवन नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति, प्रशासनिक शक्ति और संसदीय संस्कृति का बड़ा मंच है। यहां सत्ता और विपक्ष के बीच बहसें केवल राजनीतिक नहीं होतीं, बल्कि नीतियों, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और जनहित के मुद्दों पर राज्य की दिशा तय करती हैं। हरियाणा के प्रतिनिधिमंडल के लिए यह समझना अहम रहा कि एक सक्रिय विधानसभा में मीडिया, स्पीकर, सरकार, विपक्ष और प्रशासन किस प्रकार एक-दूसरे से तालमेल बनाकर लोकतंत्र को जीवंत रखते हैं।
जहां सत्ता केवल बैठती नहीं, चलती भी है: कर्नाटक विधानसभा का भव्य भवन विधान सौधा भारत की सबसे प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक इमारतों में गिना जाता है। लेकिन इसकी असली ताकत इसकी दीवारों में नहीं, बल्कि उसके भीतर चलने वाली संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में है। यही वह परिसर है जहां से—मुख्यमंत्री कार्यालय,स्पीकर कार्यालय,कैबिनेट स्तर की बैठकों का संचालन,विधानसभा और प्रशासनिक तंत्र का समन्वय जैसे राज्य शासन के सबसे अहम बिंदु संचालित होते हैं।यानी हरियाणा पीएसी का यह दौरा केवल एक भवन का भ्रमण नहीं, बल्कि राज्य सत्ता के वास्तविक तंत्र को समझने की कोशिश भी है।जहां मीडिया और विधानसभा का रिश्ता लोकतंत्र को ताकत देता है।
प्रेस एडवाइजरी कमेटी के दृष्टिकोण से यह दौरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण इसलिए भी रहा क्योंकि आज के समय में विधानसभा की कार्यवाही जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका सही, व्यवस्थित और जिम्मेदार मीडिया प्रस्तुतीकरण। कर्नाटक विधानसभा में प्रतिनिधिमंडल ने यह समझने की कोशिश की कि किस प्रकार—प्रेस गैलरी की व्यवस्था,मीडिया एक्सेस,आधिकारिक सूचना प्रवाह संसदीय कवरेज का प्रबंधन,विधानसभा और पत्रकारों के बीच संवाद को व्यवस्थित रूप से संचालित किया जाता है। यही वह क्षेत्र है जहां किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की पारदर्शिता और जनविश्वास तय होता है।

चन्द्र शेखर धरणी के नेतृत्व में सक्रिय और अध्ययनशील पहल
इस पूरे दौरे का एक बड़ा संदेश यह भी है कि हरियाणा विधानसभा की समितियां केवल औपचारिक दायित्वों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार, अध्ययन और व्यवहारिक सीख के लिए भी सक्रिय हैं। पीएसी चेयरमैन चन्द्र शेखर धरणी के नेतृत्व में यह प्रतिनिधिमंडल जिस तरह से कर्नाटक विधानसभा की व्यवस्थाओं का अध्ययन कर रहा है, वह संकेत देता है कि हरियाणा विधानसभा अपने मीडिया-संसद संबंधों, कार्यप्रणाली और संस्थागत ढांचे को और अधिक आधुनिक और प्रभावी बनाने के प्रति गंभीर है।
कर्नाटक विधानसभा पर 10 तेज राजनीतिक निष्कर्ष
1. दक्षिण की राजनीति का बड़ा पावर सेंटर
कर्नाटक विधानसभा केवल राज्य का सदन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव डालने वाली बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला है।
2. सत्ता और विपक्ष दोनों की मजबूत मौजूदगी
यहां सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी राजनीतिक धार के साथ सक्रिय भूमिका में दिखाई देते हैं, जिससे सदन की बहसें गंभीर और प्रभावशाली बनती हैं।
3. द्विसदनीय ढांचा इसे और महत्वपूर्ण बनाता है
विधानसभा और विधान परिषद—दोनों की मौजूदगी कर्नाटक की विधायी प्रक्रिया को अधिक संस्थागत और संतुलित बनाती है।
4. स्पीकर की भूमिका बेहद प्रभावशाली
कर्नाटक की राजनीति में स्पीकर की कुर्सी कई बार संवैधानिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से निर्णायक साबित हुई है।
5. मुख्यमंत्री कार्यालय और सदन का मजबूत तालमेल
यहां विधायिका और कार्यपालिका के बीच संवाद और समन्वय का ढांचा मजबूत दिखाई देता है।
6. कैबिनेट फैसलों की धुरी भी यही सत्ता परिसर
राज्य की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों की दिशा भी इसी तंत्र से निकलती है।
7. मीडिया समन्वय का अध्ययन योग्य मॉडल
प्रेस और विधानसभा के बीच संबंधों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने की दृष्टि से कर्नाटक एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
8. विधान सौधा—सिर्फ भवन नहीं, राजनीतिक संदेश
इस इमारत की भव्यता यह संदेश देती है कि लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि गौरव और संस्थागत गरिमा का विषय भी है।
9. संसदीय अनुशासन और संस्थागत गंभीरता
कर्नाटक विधानसभा की कार्यप्रणाली यह दिखाती है कि सक्रिय लोकतंत्र में प्रक्रियाओं और नियमों का कितना महत्व है।
10. हरियाणा के लिए सीख का बड़ा अवसर
यह दौरा हरियाणा विधानसभा को संसदीय, प्रशासनिक और मीडिया दृष्टि से और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में उपयोगी अनुभव दे सकता है।
हरियाणा के लिए क्या निकल सकता है इस दौरे से?
कर्नाटक विधानसभा का यह अध्ययन हरियाणा के लिए केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि व्यवहारिक उपयोगिता भी रखता है। इससे हरियाणा विधानसभा को निम्न क्षेत्रों में नई दिशा मिल सकती है—
प्रबंधन को और बेहतर बनाना
प्रेस कवरेज सिस्टम को अधिक व्यवस्थित करना
सदन और पत्रकारों के बीच समन्वय मजबूत करना
पारदर्शिता और सूचना प्रवाह को तेज करना
विधानसभा की संस्थागत गरिमा को और प्रभावी रूप में स्थापित करना
साफ संकेत: लोकतंत्र का स्तर सदन की मर्यादा और संवाद से तय होता है
हरियाणा विधानसभा की प्रेस एडवाइजरी कमेटी का यह कर्नाटक दौरा इस बात को रेखांकित करता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संवाद, प्रक्रिया, अनुशासन, पारदर्शिता और संस्थागत मजबूती से चलता है।
कर्नाटक विधानसभा के अध्ययन के बाद यह उम्मीद और मजबूत हुई है कि हरियाणा भी अपनी विधानसभा के मीडिया ढांचे, संसदीय संवाद और कार्यप्रणाली को और अधिक सशक्त और आधुनिक बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष
विधान सभा की सीढ़ियों पर पहुंचा हरियाणा का यह प्रतिनिधिमंडल केवल एक भवन देखकर नहीं लौटेगा, बल्कि लोकतंत्र की उन बारीकियों को साथ लेकर लौटेगा जो किसी भी विधानसभा को केवल सदन नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच भरोसे का मंच बनाती हैं।
चन्द्र शेखर धरणी के नेतृत्व में यह स्टडी टूर हरियाणा विधानसभा के लिए आने वाले समय में नई सोच, बेहतर समन्वय और अधिक परिपक्व संसदीय संस्कृति का आधार बन सकता है।
कर्नाटक विधानसभा क्यों मानी जाती है दक्षिण की राजनीतिक प्रयोगशाला?
कर्नाटक की राजनीति हमेशा से राष्ट्रीय स्तर पर दिलचस्पी का केंद्र रही है। कारण साफ हैं—
यहां कांग्रेस, भाजपा और जेडी(एस) जैसे दलों की सीधी टक्कर का इतिहास है
यह राज्य द्विसदनीय विधानमंडल वाला है
यहां स्पीकर की भूमिका कई बार राजनीतिक रूप से निर्णायक रही है
विधानसभा और मीडिया के रिश्ते को यहां व्यवस्थित ढंग से संचालित किया जाता है
सत्ता और विपक्ष के बीच संसदीय संघर्ष यहां अक्सर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाता है
यही वजह है कि हरियाणा पीएसी के लिए यह स्टडी टूर एक संसदीय पाठशाला की तरह साबित हुआ।
कर्नाटक विधानसभा का मुख्य भवन विधान सौधा भारत के सबसे भव्य विधान भवनों में गिना जाता है। इसकी सीढ़ियां, विशाल स्तंभ, गुंबद और शासकीय गरिमा हर आगंतुक को लोकतंत्र की ताकत का एहसास कराती हैं। यही वह परिसर है जहां से—मुख्यमंत्री कार्यालय,स्पीकर कार्यालयकैबिनेट स्तर की बैठकों का संचालन,विधायी और प्रशासनिक समन्वय होता है
विधान सभा: पत्थरों में गढ़ी सत्ता, इतिहास और शिल्प की अद्भुत मिसाल
कर्नाटक विधानसभा का नाम आते ही केवल राजनीति, सत्ता और सदन की तस्वीर नहीं उभरती, बल्कि आंखों के सामने एक ऐसी भव्य इमारत खड़ी हो जाती है, जो इतिहास, लोकतंत्र, स्थापत्य और शिल्पकला का विराट संगम है। विधान सौधा केवल कर्नाटक की सत्ता का पता नहीं, बल्कि वह प्रतीक है जहां जनता की आवाज़, सरकार का निर्णय, स्पीकर की गरिमा और प्रशासनिक शक्ति एक ही छत के नीचे दिखाई देती है।
इस भवन की खासियत सिर्फ इसकी ऊंचाई, चौड़ाई या गुंबदों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पहली और तीसरी मंजिल पर दिखाई देने वाली लकड़ी की अद्भुत कारीगरी इसे और भी विशिष्ट बनाती है। यही वजह है कि विधान सौधा को केवल विधान भवन नहीं, बल्कि कर्नाटक की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवशाली स्मारक माना जाता है।
कब बनी कर्नाटक विधानसभा और कब बना विधान सौधा
कर्नाटक की आधुनिक विधान व्यवस्था का स्वरूप 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद मजबूत रूप में सामने आया, जब भाषाई आधार पर नया मैसूर राज्य अस्तित्व में आया। बाद में 1973 में इसी राज्य का नाम कर्नाटक रखा गया। नई विधानसभा की पहली बैठक 19 दिसंबर 1956 को नव-निर्मित विधान सौधा में हुई। यही तारीख कर्नाटक की आधुनिक संसदीय यात्रा का बड़ा ऐतिहासिक पड़ाव मानी जाती है। क्षेत्रफल और आकार भी चौंकाते हैं, विधान सौधा का पैमाना इसकी भव्यता को खुद बयान करता है।
मुख्य आंकड़े
कुल परिसर व आसपास का क्षेत्र — लगभग 60 एकड़
कुल निर्मित फ्लोर एरिया — 5,05,505 वर्ग फुट
तीन मुख्य मंजिलें — प्रत्येक 1,32,400 वर्ग फुट से अधिक
शीर्ष (टॉप) मंजिल — लगभग 1,01,165 वर्ग फुट
लंबाई — 700 फुट
चौड़ाई — 350 फुट
केंद्रीय गुंबद तक ऊंचाई — 150 फुट
भव्य स्थापत्य की पहचान
सामने 45 सीढ़ियों वाली विशाल सीढ़ीदार एंट्री
12 विशाल स्तंभ, प्रत्येक लगभग 40 फुट ऊंचा
एक केंद्रीय गुंबद और 6 छोटे गुंबद विशाल केंद्रीय विंग, जिसमें विधानसभा कक्ष स्थित है। इन आयामों से साफ है कि यह भवन साधारण प्रशासनिक इमारत नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति, गरिमा और संवैधानिक महत्व का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
ऐतिहासिक महत्व:
कर्नाटक के लोकतंत्र की जड़ें इससे भी पुरानी हैं। कर्नाटक की लोकतांत्रिक परंपरा केवल 1956 से शुरू नहीं होती। इसकी जड़ें 1881 तक जाती हैं, जब तत्कालीन मैसूर रियासत में मysore Representative Assembly की शुरुआत हुई थी। यही परंपरा आगे चलकर आधुनिक विधान व्यवस्था में बदली। इतिहासकारों और आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, उस दौर में मैसूर को भारत के सबसे प्रगतिशील और जन-भागीदारी वाले प्रशासनिक राज्यों में गिना जाता था। इसीलिए विधान सभा केवल एक इमारत नहीं, बल्कि एक लंबे लोकतांत्रिक विकासक्रम का आधुनिक प्रतीक है।