राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार के खिलाफ इन्हें उम्मीदवार बना सकती है BJP, दोनों सीटें जीतने की तैयारी में सरकार
punjabkesari.in Friday, Feb 27, 2026 - 08:45 AM (IST)
चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों के लिए भाजपा दोनों ही सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। जातीय समीकरणों के आधार पर एक सीट पर भाजपा की जीत पहले ही तय है। दूसरी सीट जिस पर कांग्रेस का पलड़ा भारी है। कांग्रेस के खेमे में सेंध लगाने के लिए उस सीट पर भाजपा कांग्रेस के किले में सेंधमारी करने के लिए सी एम के राजनैतिक सचिव व पुराने कांग्रेसी तरुण भंडारी को संभावित उम्मीदवार बना सकती है। तरुण भंडारी ही वह शख्स है जो नवीन जिंदल,किरण चौधरी जैसे दर्जनों चेहरों को अतीत में भाजपा में शामिल करवा चुके हैं।
हाल ही में केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल का पंचकूला में तरुण भंडारी के घर अचानक पहुंचना कई राजनैतिक संकेत दे गया है।यह यात्रा मनोहर लाल की पारिवारिक यात्रा थी,परिवार से मिले।गपशप की व काफी समय बिताया।कोई राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था। तरुण भंडारी केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल व हरियाणा के सी एम नायब सिंह सैनी दोनों के प्रिय हैं।भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भी इनकी खासी पकड़ है।हिमाचल की सुक्खू सरकार के निर्दलीय व कांग्रेस विधायकों में भंडारी अपने रण कौशल का परिचय देकर हिमाचल के हर्ष महाजन को राज्य सभा सीट जितवा चुके हैं।यही खेल भंडारी हरियाणा कांग्रेस के विधायकों में खेल सकते हैं।
फिलहाल पंजाबी चेहरे में से कोई भी राज्यसभा में नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ी दावेदारी पंजाबी समुदाय की मानी जा रही है। हालांकि कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़ प्रदेश भाजपा के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भी बीजेपी के बड़े जाट चेहरे हैं। फिलहाल रामचंद्र जांगड़ा पिछड़ा वर्ग, किरण चौधरी तथा सुभाष बराला जाट समाज, इसके अलावा रेखा शर्मा और निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा जो कि भाजपा के समर्थन से बने हैं दोनों ही ब्राह्मण समाज से हैं। ऐसे में राजनीतिक पंडितों की माने तो सभी लोगों के हिस्सेदारी को देखते हुए पंजाबी वैश्य या फिर अनुसूचित जाति के किसी नेता की लॉटरी भी लग सकती है।क्योंकि प्रदेश में मुख्यमंत्री का पद भी पिछड़े वर्ग के रूप में नायब सैनी के पास है। यह देखने वाली बात होगी की कांग्रेस के अलावा बीजेपी से भी अगला राज्यसभा सदस्य कौन होगा लेकिन भाजपा की रणनीति हमेशा चौकाने वाली ही होती है।
बता दें कि तरुण भंडारी ने 2019 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी ज्वाइन की थी। उसके बाद से ही अब तक लगातार वह पूरे देश में कांग्रेस के 100 के करीब बड़े चेहरों को बीजेपी में शामिल करवा चुके हैं। किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी का बीजेपी में शामिल होना तरुण भंडारी की राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा है। मनोहर लाल के बीरबल के रूप में भूमिका निभाने वाले तरुण भंडारी मौजूदा मुख्यमंत्री नायब सैनी के भी खास व्यक्तियों में शुमार हो चुके हैं। किरण और श्रुति चौधरी के बीजेपी में शामिल होने के लिए पार्टी मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में भी तरुण भंडारी प्रमुख चेहरे के रूप में नजर आ रहे थे।
तंवर और जिंदल को करवाया था शामिल
इससे पहले हरियाणा में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तरुण भंडारी ने कांग्रेस के पूर्व सांसद नवीन जिंदल और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को भी बीजेपी में शामिल करवाया था, जिन्हें पार्टी ने क्रमश: कुरुक्षेत्र और सिरसा से लोकसभा चुनाव में उतारा था। इनमें नवीन जिंदल चुनाव जितने में कामयाब हो गए थे, लेकिन अशोक तंवर चुनाव नहीं जीत पाए थे। हालांकि तंवर के चुनाव हारने के पीछे कई कारण बताए जा रहे है, जिनमें उनकी ओर से लगाया गया पार्टी पदाधिकारियों के भीतरघात का आरोप भी एक है। बाद में तंवर फिर कांग्रेस में लौट गए।
तरुण भंडारी को मुख्यमंत्री व भाजपा नेतृत्व का विश्वासपात्र रणनीतिक सहयोगी माना जाता है और हरियाणा की सक्रिय राजनीतिक नियुक्तियों में उनकी भूमिका प्रभावशाली मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक नेताओं से संवाद के माध्यम से सरकार समाज के विभिन्न वर्गों तक सीधे पहुंच बनाने की रणनीति पर कार्य कर रही है। इस कड़ी में तरुण भंडारी मुख्यमंत्री और धार्मिक नेतृत्व के बीच समन्वय सेतु के रूप में उभरे हैं। मुख्यमंत्री की संत-महात्माओं, गुरुद्वारों, मंदिर समितियों एवं अन्य धार्मिक प्रतिनिधियों से मुलाकातों को सामाजिक समरसता, जनभागीदारी और सकारात्मक संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
हिमाचल में किया था ‘खेला’
मनोहर लाल के मुख्यमंत्री रहते हरियाणा में मुख्यमंत्री के तब के पब्लिसिटी एडवाइजर तरुण भंडारी ने पूर्व में हिमाचल में हुए राज्यसभा चुनाव में सत्ता दल कांग्रेस में तारपिडो करते हुए कांग्रेस के 6 विधायकों और 3 निर्दलीय विधायकों से बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान कराया था। ऐसा करके जहां तरुण भंडारी ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया। वहीं, उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। नतीजा ये हुआ कि हिमाचल में सत्ता पक्ष की ओर से शिमला में उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज करवाई गई, जिसमें एक दिन पूर्व ही हिमाचल पुलिस की एसआईटी ने उनसे पूछताछ की है।
दिल्ली में अपनी बेटी श्रुति चौधरी के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद पूर्व मंत्री किरण चौधरी ने भी मंच से तरुण भंडारी का नाम लिया था। किरण ने साफ तौर पर कहा कि यहां तक पहुंचने में तरुण भंडारी का सबसे अधिक सहयोग रहा है। मतलब साफ है कि किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति समेत उनके हजारों समर्थकों को बीजेपी में लाने का श्रेय तरुण भंडारी को ही जाता है। बताया जाता है कि बीजेपी में शामिल होने से पहले भंडारी इन दोनों की केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल और पार्टी के कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ मीटिंग भी करवा चुके थे। यहीं कारण है कि अपने कुशल राजनीतिक कौशल का परिचय दे चुके तरुण भंडारी मनोहर लाल के अलावा हरियाणा में पार्टी के चाणक्या बनते जा रहे हैं। उनके कुशल राजनीतिक कौशल का ही कारण है कि वह पार्टी हाई कमान के भी चहेते नेताओं में शुमार होते जा रहे हैं।
राज्यसभा चुना में जून 2022 (पिछला चुनाव) जो 10-11 जून 2022 को हुआ में हरियाणा से कुल 2 राज्यसभा सीटें थीं।भारतीय जनता पार्टी के कृष्ण लाल पंवार ने पहली सीट जीत ली थी। दूसरी सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा जीते, जिनका समर्थन भाजपा ने हासिल किया।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन हार गए। इस चुनाव में भाजपा के पास हरियाणा विधानसभा में पर्याप्त संख्या विधायकों की थी। एक सीट भाजपा के पारंपरिक संख्याबल के कारण पक्की थी, लेकिन दूसरी सीट पर निर्दलीय (भाजपा-समर्थित) उम्मीदवार को जीत मिली क्योंकि कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी।हरियाणा के राज्यसभा चुनावों में “पेन–स्याही” विवाद इससे पहले बड़े स्तर पर दर्ज नहीं हुआ था। 2022 की घटना को राज्य के राज्यसभा चुनावों का सबसे चर्चित प्रक्रियात्मक विवाद माना जाता है।
हरियाणा की राजनीति में वर्ष 2016 का राज्यसभा चुनाव बेहद चर्चित और नाटकीय घटनाक्रम के रूप में याद किया जाता है। 11 जून 2016 को हुए इस चुनाव ने यह साबित किया कि राज्यसभा का चुनाव केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि विधानसभा के ठोस गणित और राजनीतिक प्रबंधन पर निर्भर करता है। इस चुनाव में दो सीटों के लिए मतदान हुआ। प्रमुख उम्मीदवार थे:सुभाष चंद्रा निर्दलीय, लेकिन भाजपा समर्थित,आर के आनंद — निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी। विधानसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत था। यही बहुमत चुनाव की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। भाजपा के पास अपने विधायकों का मजबूत और संगठित समर्थन था। पार्टी ने सुभाष चंद्रा को समर्थन देकर चुनाव को रणनीतिक रूप से संचालित किया।
दूसरी ओर, आर.के. आनंद निर्दलीय उम्मीदवार थे और उनके पास किसी बड़े दल का ठोस समर्थन नहीं था। विपक्षी खेमे में भी उस समय पूर्ण एकजुटता नहीं दिखी। आर.के. आनंद संख्या बल की कमी थी। उनके पक्ष में पर्याप्त विधायक नहीं जुट पाए।यह चुनाव इसलिए चर्चित हुआ क्योंकि इसमें राजनीतिक प्रबंधन, क्रॉस वोटिंग की चर्चाएँ और संख्या बल का सीधा प्रभाव देखने को मिला।आर.के. आनंद की हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्यसभा चुनाव में व्यक्तिगत पहचान से अधिक महत्वपूर्ण होता है — विधानसभा का अंकगणित और दलों की रणनीतिक एकजुटता। 2016 का हरियाणा राज्यसभा चुनाव एक उदाहरण है कि किस प्रकार बहुमत, रणनीति और संगठनात्मक शक्ति चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं। आर.के. आनंद की पराजय केवल व्यक्तिगत हार नहीं थी, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभा गणित का परिणाम थी।
यहाँ 2026 हरियाणा राज्यसभा चुनाव में विधायकों का गणित विशेष रूप से राज्यसभा की दो सीटों के लिए:
हरियाणा विधान सभा में कुल 90 सदस्य विधायक हैं। (भाजपा): 48 विधायक, (कांग्रेस): 37 विधायक, 2 विधायक,निर्दलीय : 3 विधायक हैं। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 31 विधायक वोट देना जरूरी है। यदि कोई दल के पास 62 विधायक (दो सीटों के लिए 31×2) होते, तो वह दोनों सीटें ले सकता है, लेकिन हरियाणा में ऐसा नहीं है। भाजपा के पास 48 विधायक हैं। इसलिए भाजपा अपने एक उम्मीदवार को आसानी से जितवा सकती है। लेकिन दूसरी सीट के लिए भाजपा को: सहयोगी या निर्दलीय विधायकों का समर्थन चाहिए।फिलहाल कांग्रेस के 37 विधायक हैं, इसलिए भाजपा अकेले में दूसरी सीट नहीं जीत सकती (48 से 62 वोटों का समर्थन नहीं है)।
कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं। इसलिए कांग्रेस भी अपने एक उम्मीदवार को जितवा सकती है, बशर्ते उसके विधायक पार्टी लाइन पर वोट दें। राज्यसभा का चुनाव सिर्फ “मतदान” नहीं है — यह राजनीतिक संख्या-बल + रणनीति का खेल है। विधायक किस उम्मीदवार को वोट देते हैं, यह पार्टी बैठकों, अनुशासन और रणनीति पर निर्भर करता है। क्रॉस-वोटिंग (कभी-कभी विधायक अपने दल से अलग वोट देना) चुनाव के नतीजों को बदल सकता है — जैसा 2022 में हुआ था।