सूचना आयोग के आदेश बावजूद हरियाणा में आर.टी.आई. आवेदनकर्ता से मांगी जा रही आई.डी.
punjabkesari.in Tuesday, Feb 22, 2022 - 05:36 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा सूचना आयोग के तत्कालीन सूचना आयुक्त के.जे. सिंह द्वारा गत वर्ष जून, 2021 में एक मामले में दिए गए फैसले में स्पष्ट किया गया था कि कोई भी पब्लिक अथॉरिटी (लोक प्राधिकारी ) द्वारा आरटीआई आवेदनकर्ता से ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वह संबंधित आरटीआई नियमोें में डाले गए निर्धारित मॉडल फॉर्म/ (आदर्श प्रारूप ) में ही आरटीआई याचिका /आवेदन दायर करे. इसी प्रकार आवेदनकर्ता से सूचना मांगने का कारण स्पष्ट करने को भी नहीं कहा जा सकता है और उससे उतना ही ब्यौरा मांगा जा सकता है जितना उसकी आरटीआई की सूचना/जवाब देने के लिए पर्याप्त हो अर्थात आवेदनकर्ता को आवेदन के साथ उसकी आईडी ( पहचान पत्र ) संलंग्न करने को नहीं कहा जा सकता है परन्तु इसके बावजूद हरियाणा में आरटीआई आवेदन के साथ आवेदनकर्ता की आईडी मांगी जा रही है.
ताज़ा मामले में बीती 18 फरवरी 2020 को हरियाणा के मुख्य सचिव कार्यालय के अधीन आने वाले प्रशासनिक सुधार विभाग के अंतर्गत सिविल सचिवालय में गठित आरटीआई सैल से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार को एक पत्र भेजा गया है जिस पर प्रशासनिक सुधार विभाग के मौजूदा अंडर सैक्रेटरी (अवर सचिव), जो उक्त विभाग के राज्य जन सूचना अधिकारी (एसपीआईओ) भी हैं, के हस्ताक्षर हैं एवं उसमें उल्लेख है कि उनके विभाग द्वारा 6 मई 2021 को जारी एक पत्र अनुसार आरटीआई आवेदन के साथ पहचान पत्र की प्रति संलग्न करना अनिवार्य किया गया है. चूँकि आवेदनकर्ता ने आवेदन के साथ उनके पहचान पत्र की प्रति संलग्न नहीं की है, इसलिए पहचान पत्र की प्रति तुरंत भिजवाएं ताकि आगामी कार्यवाही की जा सके.
बहरहाल, हेमंत ने बताया कि जहाँ तक उनकी उपरोक्त आरटीआई का विषय है, तो उन्होंने यह मुख्य तौर पर 29 दिसंबर, 2022 में भारत सरकार के कानून मंत्रालय में ऑनलाइन दायर कर सूचना मांगी थी जिसमें हरियाणा विधानसभा द्वारा गत वर्ष मार्च, 2021 में 4 केंद्रीय कानूनों के नाम में बगैर केंद्र सरकार की स्वीकृति के संशोधन कर पंजाब के स्थान पर हरियाणा शब्द डाल दिया गया था. कानून मंत्रालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को उक्त आरटीआई ट्रांसफर कर दी जिसके डेढ़ माह बाद उन्हें इसी महीने जवाब दिया गया कि चूँकि मांगी आयी सूचना हरियाणा सरकार से संबधित है, इसलिए उनकी आरटीआई प्रदेश सरकार (मुख्य सचिव ) को ट्रांसफर की जा रही है. ज्ञात रहे कि केंद्र सरकार ने कानून और गृह दोनों मंत्रालयों द्वारा आवेदनकर्ता से उनकी आई.डीकी प्रति नहीं मांगी गयी.

हेमंत ने बताया कि जहाँ तक आरटीआई कानून, 2005 का विषय है, तो इसकी धारा 6 (2 ) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि सूचना के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक से सूचना का अनुरोध करने के लिए किसी कारण को या किसी अन्य व्यक्तिगत ब्यौरे को , सिवाए उसके जो उससे संपर्क करने के लिए आवश्यक हो, देने की मांग नहीं की जायेगी. हालांकि नवंबर, 2012 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के तत्कालीन जज राजेश बिंदल द्वारा दिए एक आदेश के अनुसार जन सूचना अधिकारी के समक्ष दायर शिकायतों, प्रथम अपीलीय अथॉरिटी के समक्ष दायर अपील और सूचना आयोग में जारी कार्यवाही में आवेदनकर्ता को अपना पहचान पत्र (आईडी) दायर करना आवश्यक किया गया था. अब चूँकि सूचना प्राप्त करने के लिए राज्य जन सूचना अधिकारी (एसपीआईओ ) के समक्ष केवल आरटीआई आवेदन ही दायर किया जाता है जबकि शिकायत केवल धारा 18 में राज्य /केंद्रीय सूचना आयोग में ही दायर की जा सकती है, अत: हाई कोर्ट के उपरोक्त निर्णय की अनुपालना में एसपीआईओ के समक्ष आवेदन के साथ आईडी संलग्न करने की कोई आवश्यकता नहीं हो सकती है.
हेमंत ने बताया कि वैसे भी पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के सिंगल जज के उपरोक्त आदेश के एक वर्ष बाद नवबर, 2013 में कलकत्ता हाईकोर्ट के डिवीजन (दो जज) बैंच का भी एक फैसला आया जिसमें हालांकि स्पष्ट किया गया कि आरटीआई के साथ आवेदनकर्ता की संपूर्ण और निजी जानकारी मांगने और संलग्न करने की कानूनन कोई आवश्यकता नहीं है. केन्द्र सरकार के कार्मिक विभाग (डीओपीटी) ने जनवरी, 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट के उपरोक्त फैसले की प्रति हरियाणा सहित सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों को संज्ञान में लाने और उचित कार्यवाही हेतु भेजी भी थी. अब इसके बावजूद हरियाणा सरकार ने आरटीआई आवेदन के साथ आईडी संलग्न करना, हालांकि राज्य के आरटीआई नियमोें, 2009 में स्पष्ट उल्लेख न कर केवल आरटीआई आवेदन के मॉडल फॉर्म/ (आदर्श प्रारूप ) में डालकर, क्यों अनिवार्य किया गया, यह निश्चित तौर पर जांच करने योग्य है.