हर गुमशुदगी पर अब तुरंत एक्शन; हरियाणा में नई SOP लागू, परिजनों की ''24 घंटे इंतजार करो'' की व्यवस्था खत्म
punjabkesari.in Saturday, Aug 08, 2026 - 03:34 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा में किसी बच्चे, महिला, बुजुर्ग या अन्य व्यक्ति के लापता होने पर अब परिजनों को 24 घंटे इंतजार करने या अपने स्तर पर तलाश करने की सलाह नहीं दी जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रदेश सरकार ने गुमशुदगी के मामलों में नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू कर दी है। इसके तहत सूचना मिलते ही पुलिस को तत्काल एफआईआर दर्ज कर खोज अभियान शुरू करना होगा।
नई व्यवस्था में पहले घंटे की कार्रवाई को सबसे अहम माना गया है। पुलिस अब गुमशुदगी की सूचना को सामान्य शिकायत मानकर कार्रवाई टाल नहीं सकेगी। एफआईआर दर्ज होने के साथ ही सीसीटीवी फुटेज खंगालने, मोबाइल लोकेशन की जांच करने, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों को अलर्ट करने तथा पड़ोसी जिलों और राज्यों को सूचना भेजने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
परिजनों से पहले पुलिस की होगी जिम्मेदारी
नई एसओपी में सबसे बड़ा बदलाव पुलिस की जवाबदेही को लेकर है। पहले कई मामलों में परिजनों को 24 घंटे बाद आने या पहले स्वयं तलाश करने के लिए कहा जाता था। अब यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस को कानूनी कार्रवाई और तलाश शुरू करनी होगी।
गुमशुदा व्यक्ति का विवरण संबंधित डिजिटल पोर्टलों पर भी अपलोड किया जाएगा, ताकि दूसरे जिलों और राज्यों की पुलिस तक उसकी जानकारी तत्काल पहुंच सके।
पहले घंटे में शुरू होगी बहुआयामी तलाश
गुमशुदगी की सूचना मिलने के बाद पुलिस को एक साथ कई स्तरों पर काम करना होगा। आसपास के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जुटाने के साथ मोबाइल फोन की लोकेशन खंगाली जाएगी। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और अन्य संभावित स्थानों पर सूचना भेजी जाएगी।
इसके अलावा पड़ोसी जिलों और राज्यों को भी तत्काल अलर्ट किया जाएगा। इससे गुमशुदा व्यक्ति के दूसरे जिले या राज्य में चले जाने की स्थिति में भी तलाश को आगे बढ़ाया जा सकेगा।
आधार और बायोमेट्रिक से आसान होगी पहचान
बरामद किए गए व्यक्तियों की पहचान सत्यापित करने के लिए आधार और बायोमेट्रिक प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे उन लोगों की पहचान करने में मदद मिलेगी जो मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, अपनी पहचान बताने में सक्षम नहीं हैं या लंबे समय से लापता हैं।
जिन बरामद व्यक्तियों के पास आधार नहीं होगा, उनका आधार नामांकन कराने की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी।
तस्करी का संदेह तो एएचटीयू संभालेगी मामला
यदि प्रारंभिक जांच में मानव तस्करी की आशंका सामने आती है तो मामला केवल स्थानीय थाना स्तर की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे मामलों को तत्काल एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) को सौंपा जाएगा।
इससे संगठित तस्करी गिरोहों की भूमिका की जांच तेजी से शुरू करने और दूसरे जिलों या राज्यों से जुड़े नेटवर्क तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
बच्चों की बरामदगी में सुरक्षा सबसे पहले
बच्चों से जुड़े मामलों में भी एसओपी के तहत विशेष सावधानी बरतने के निर्देश हैं। यदि बच्चे के शोषण, तस्करी या परिवार के किसी सदस्य की संलिप्तता का संदेह हो तो उसे सीधे परिजनों को नहीं सौंपा जाएगा।
ऐसे मामलों में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कमेटी बच्चे की सुरक्षा, देखभाल, पुनर्वास और आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगी।
कई डिजिटल सिस्टम एक नेटवर्क में
नई व्यवस्था के तहत गुमशुदगी की जांच को विभिन्न डिजिटल प्रणालियों से जोड़ा गया है। ट्रैक चाइल्ड, सीसीटीएनएस, जिपनेट, जिला स्तर की विशेष टीमें और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट आपसी समन्वय से काम करेंगे।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गुमशुदा व्यक्ति यदि दूसरे जिले या राज्य में पहुंच जाए तो उसकी सूचना संबंधित पुलिस एजेंसियों तक बिना देरी पहुंच सके।
गुमशुदगी अब सिर्फ शिकायत नहीं, तत्काल पुलिस कार्रवाई का मामला
नई एसओपी का मूल उद्देश्य गुमशुदगी के मामलों में शुरुआती समय की अहमियत को समझते हुए पुलिस की प्रतिक्रिया को तेज करना है। अब गुमशुदगी को केवल डीडी एंट्री या सामान्य शिकायत के तौर पर छोड़ने के बजाय तत्काल कानूनी कार्रवाई, तलाश और डिजिटल अलर्ट की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
इस बदलाव से खास तौर पर उन परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है जो अपने किसी सदस्य के अचानक लापता होने के बाद पुलिस कार्रवाई के लिए घंटों इंतजार करते थे।
गुमशुदगी के बाद अब ये कार्रवाई जरूरी
सूचना मिलते ही तत्काल एफआईआर दर्ज होगी।
24 घंटे इंतजार करने की व्यवस्था समाप्त होगी।
पहले घंटे से खोज अभियान शुरू होगा।
सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल लोकेशन की जांच होगी।
बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों को अलर्ट किया जाएगा।
पड़ोसी जिलों और राज्यों को तत्काल सूचना दी जाएगी।
गुमशुदा व्यक्ति का विवरण डिजिटल पोर्टलों पर अपलोड होगा।
बरामद व्यक्ति की पहचान आधार और बायोमेट्रिक से सत्यापित की जाएगी।
मानव तस्करी का संदेह होने पर मामला एएचटीयू को सौंपा जाएगा।
बच्चों के मामलों में जरूरत पड़ने पर सीडब्ल्यूसी की मंजूरी के बिना सीधे परिजनों को नहीं सौंपा जाएगा।
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