लंबे समय से राजनीतिक अनदेखी का शिकार मोरनी का कायाकल्प कर रहे मनोहर लाल खट्टर

2021-06-20T20:25:35.927

पंचकूला (धरणी): प्रकृति की गोद में विराजमान, खूबसूरत झरनों, प्राकृतिक संसाधनों और सुंदरताओं से लबालब भरा पंचकूला के मोरनी का अब और आकर्षक बनना तय हो गया है। पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौ. देवी लाल का बेहद पसंदीदा स्थान मोरनी लंबे समय तक राजनीतिक अनदेखी का शिकार बना था, लेकिन करीब 3 दशक के बाद अब हरियाणा के मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने इसकी सुध लेने की न केवल ठानी है, बल्कि इसका कायाकल्प करने को लेकर बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है। 

बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री स्व. चौ. देवीलाल मोरनी में अक्सर आया जाया करते थे और आलाधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें करने के साथ-साथ यहां खुला दरबार लगाते थे। सही मायने में तो मोरनी को पहचान देने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान चौ0 देवी लाल व अब मनोहर लाल का ही माना जाता है।

मोरनी से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित टिक्कड ताल को रोमांचक टूरिज्म बनाने के लिए विकसित करने का काम शुरू कर दिया गया है। हिमाचल प्रदेश में डलहौज़ी से कुछ दूरी पर स्थित पर्यटन स्थल खजियार के जैसा भौगोलिक वातावरण टिक्कड ताल का है। लेकिन टिक्कड ताल खजियार की तरह पहचान बनाने में अभी तक असमर्थ रहा है। यहां पर्यटन विभाग द्वारा रहने, ठहरने और भोजन की व्यवस्था की हुई है। यहां स्थित झील में वोटिंग का प्रबंध भी लंबे अरसे से होता आ रहा है। हरियाणा का एकमात्र पहाड़ी पर्यटन स्थल मोरनी तथा टिक्करताल पर्यटकों को आकर्षित करने में बहुत ज्यादा कामयाब नहीं हो पाया था। इसके चलते अब हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने रोमांचक खेलों के माध्यम से एक नया प्रयोग किया है।

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यहां लोगों में चर्चा है कि पांडवों ने अपने 1 साल के अज्ञातवास का कुछ समय यहां बिताया था। पहाड़ों की गोद में मौजूद टिक्कड ताल में टूरिज्म विभाग का माउंटेन कवेल के नाम का एक होटल भी है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के चलते यहां आज तक भी शराब की बिक्री पर पूर्णत पाबंदी है। मोरनी एक रमणीक स्थान है और पुराने शासकों का एक छोटा सा किला-छोटा सा राजमहल यहां पर मौजूद है। जिसे हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा एक लग्जरी होटल में बदलने की योजना पर काम चल रहा है। हरियाणा सरकार द्वारा यहां एक एडवेंचर पार्क का भी निर्माण किया है। जंपलिंग, बर्मा ब्रिज, नेट क्लाइंबिंग और अन्य कई एडवेंचर गतिविधियों का आप यहां आनंद ले सकते हैं। मोरनी जाते वक्त कई प्रकार के खूबसूरत झरने देखने को मिलते हैं। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती के जरिए पर्यटन विभाग अपनी बिगडी माली हालत को सुधारने को लेकर कई तरह के प्रयासों पर लगा है। प्रदेश के टूरिज्म विभाग द्वारा यहां ई हाइड्रोफॉयल, ट्राइक पावर मोटरिंग, जार्बिंग, ड्रैगन बोट, हॉट एयर बैलून का ट्रायल चल रहा है। जबकि जेट स्कूटर, पैराग्लाइडिंग इत्यादि कई सुविधाएं जनता के लिए अलाउ कर दी गई हैं।

मोरनी हिल्स भ्रमण की शुरूआत यहां से 8 किमी की दूरी पर स्थित टिक्कर ताल से कर सकते हैं। यह ताल अपनी दो खूबसूरत झीलों के लिए जाना जाता है, जहां पर्यटन समय बिताना ज्यादा पसंद करते हैं। शिवालिक श्रृंखला के परिदृश्य के साथ यह स्थल सैलानियों को काफी ज्यादा प्रभावित करने का काम करता है। एक चट्टानी पहाड़ी इस दो जुड़वा तालों को अलग करने का काम करती हैं। इन झीलों के नाम है बड़ा ताल और छोटा ताल। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह स्थल काफी ज्यादा मायने रखता है। एक शानदार अनुभव के लिए आप यहां की यात्रा कर सकते हैं।



एडवेंचर पार्क
मोरनी हिल्स में आप प्राकृतिक व धार्मिक स्थलों को देखने के अलावा एडवेंचर गतिविधियों का भी आनंद ले सकते हैं। पर्यटन को ध्यान में रखते हुए हरियाणा सरकार ने यहां एक एडवेंचर पार्क का निर्माण किया है, जहां आप विभिन्न रोमांचक गतिविधियों का हिस्सा बना सकते हैं। यहां आप ज़िपलिंग, बर्मा ब्रिज और नेट क्लाइंबिंग जैसे एडवेंचर का अनुभव ले सकते हैं। यह पार्क उन लोगों के लिए भी खास माना जाता है जो सेफ ज़ोन में रहकर एडवेंचर का आनंद लेना चाहते हैं। यहां बच्चे भी रोमांचक स्पोट्र्स का मजा ले सकते हैं।

मोरनी का इतिहास
शिवालिक की पहाडिय़ों में स्थित मोरनी नामक एक छोटे से कस्बे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर एक किले की इमारत है, जिसके दरवाजे पर लगे हुए परिचय पत्थर पर लिखी हुई इबारत एक ऐसे झरोखे का काम करती है, जो हमें इतिहास की कुछ भूली-बिसरी पगडंडियों की ओर ले जाता है। इस पर लिखा है-
‘दिनांक 26-10-1816 को भारत के गवर्नर जनरल ने एक सनद के द्वारा मीर जाफर अली को उसके पुश्तैनी अधिकारों  व गुरखाओं के विरुद्ध लड़ाई में अंग्रेजी फौज की सहायता करने के एवज में इन पहाड़ों पर हक सौंपा था ज्.।’ इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए इसमें कई दिलचस्प संकेत हैं।'

मोरनी शिवालिक की पहाडिय़ों की श्रृखंला का हिस्सा है। ऐतिहासिक, भौगोलिक व सांस्कृतिक दृष्टि से मोरनी का जुड़ाव  हिमाचल प्रदेश के सिरमोर जिले से है। हरियाणा में इसके होने का भी इतिहास है। इसका संक्षिप्त ब्यौरा निम्न प्रकार है। सन् 1948 में 28 रियासतों को मिलाकर एक चीफ कमीश्नर के अधीन एक प्रांत बना जिसे सन् 1950 में लैफ्टिनैंट गवर्नर के अधीन पार्ट-सी राज्य बना दिया गया और कालांतर में सन् 1956 में यूनियन टैरिटरी बन गया। सन् 1965 में भाषाई राज्य की बारम्बार मांग की वजह से सरदार हुक्मसिंह की अध्यक्षता में 22 सदस्यों का संसदीय कमीशन बना, जिसने सिफारिश की कि शिमला, लाहौल स्पीती, कुल्लू और कांगड़ा में पहाड़ी जिले और पठानकोट तहसील का डल्होजी इलाका, ऊना तहसील का अधिकांश इलाका व अम्बाला जिला की नालागढ़ तहसील हि.प्र. में मिलाई जाए। 

जब मोरनी का मुद्दा सामने आया तो हि.प्र. ने 93 वर्ग मील के इस इलाके पर जो नारायणगढ़ तहसील का 20 प्रतिशत हिस्सा था और भाषा, संस्कृति, भूगोल, इतिहास और परम्परा आदि के सभी पहलुओं के आधार पर इसे जोरदार ढंग से मांगा, लेकिन शाह कमीशन (बाऊंडरी कमीशन) ने नारायणगढ़ तहसील के टुकड़े न करने का फैसला लिया और इस प्रकार हरियाणा को मोरनी के रूप में एकमात्र हिल स्टेशन मिल गया।

मोरनी का किला-मोरनी की पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर करीब 1200 मीटर की ऊंचाई पर 17वीं शताब्दी में बनाया गया यह किला पत्थरों से बनाई गई एक साधारण इमारत है। इसके चार बुर्ज हैं और मुख्य दरवाजा पूर्व दिशा में है। कभी इसके केंद्र में एक कुआं भी था। सन् 1814 में जब गुरखाओं ने नाहन पर कब्जा कर लिया था तो सिरमोर के राजा ने यहां शरण ली थी और आवश्यकतानुसार किले के अंदर रिहायशी इन्तजाम किए गए थे।

सन् 1857 के विद्रोह के दौरान तत्कालीन मीर अकबर अली खां अंग्रेजों की शक की निगाह में आ गया। उसके इलाके से जमुना की तरफ जाने वाले बागियों को पकड़वाने में कोताही के आरोप में अम्बाला के डिप्टी कमीशनर टीडी फोर्सिथ ने उस पर एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया। शक की गुंजाइश और बढ़ गई जब सितम्बर 1857 में मुज्जफरनगर से उसके दामाद का पत्र पकड़ा गया। कोताहा के किले की तलाशी के दौरान आपत्तिजनक युद्ध सामग्री पाने पर पंजाब के चीफ कमीशनर के हुक्म से कोताहा और मोरनी के किले तोड़ डाले गए। बाद में 1864 में अंग्रेज सरकार ने षड्यंत्र के आरोप में कोताहा के किले को धूल धूसरित करवा दिया, जिसके लिए एक सिविल इंजीनियर को दो महीने लगे। बाद में मीर पर मोरनी और कोताहा में रहने पर पाबंदी लगा दी। हालांकि सन् 1880 में तत्कालीन मीर के रुतबे को बहाल कर दिया।

चंडीगढ़ में स्थित म्यूजियम और आर्ट गैलरी में प्रदर्शित कुछ प्राचीन मूर्तियों पर एक नजर डालें जो सन् 1970 मोरनी के ताल की खुदाई के दौरान पाई गई हैं। पत्थर से तराशी गई इन मूर्तियों में 10वीं से 13वीं शताब्दी तक की धार्मिक-सांस्कृतिक  झलक मिलती है। महिषासुर मर्दिनी शिव कामांतका, सकुलिशा (शिव का आखिरी अवतार) की मूर्तियां इस बात का संकेत देती हैं कि इस इलाके में शैव परम्परा का प्रचलन था। मोरनी-बडयाल सड़क पर (नाहन की ओर जाते हुए) मोरनी से 16 किलोमीटर दूर बनी गांव में  स्थित भद्रकाली का प्राचीन मंदिर के अवशेष भी इसी बात की ओर इशारा करते हैं। मीर जाफर अली को भेंट की गई सनद में भी भवानी देवी के दो मन्दिरों का जिक्र आता है।


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Content Writer

Shivam

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