ट्रेन से गिरकर हेडमास्टर की मौत पर रेलवे देगा मुआवजा, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज की आत्महत्या की दलील
punjabkesari.in Thursday, Oct 29, 2026 - 02:41 PM (IST)
चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी) : रेलवे ट्रैक के पास शव मिलना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि व्यक्ति ने आत्महत्या की थी या वह नशे में था। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे दुर्घटना में मुआवजे के दावे का आकलन उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
अदालत ने कैथल के सरकारी स्कूल में कार्यरत हेडमास्टर सूरजभान की मौत के मामले में रेलवे दावा अधिकरण का फैसला रद कर उनकी पत्नी और अन्य आश्रितों को मुआवजा देने का आदेश दिया। जस्टिस हरकेश मनुजा ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे यह साबित नहीं कर सका कि सूरजभान ने आत्महत्या की थी या वह नशे की हालत में थे। मुआवजे के साथ दावा आवेदन दाखिल करने की तारीख से नौ प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया।
सूरजभान जिला कैथल के मेंगरा स्थित सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे। वह सात दिसंबर 2011 को ड्यूटी के लिए घर से निकले, लेकिन लौटे नहीं। परिजनों के अनुसार, उन्होंने 12 दिसंबर को कुरुक्षेत्र से अंबाला कैंट और 13 दिसंबर को अंबाला कैंट से पटियाला जाने का रेल टिकट खरीदा था। वह यात्री ट्रेन में सवार हुए थे। 14 दिसंबर को राजपुरा के पास रेलवे ट्रैक से उनका शव मिला। परिजनों ने उनकी पहचान कर मुआवजे का दावा किया।
रेलवे दावा अधिकरण, चंडीगढ़ ने 10 नवंबर 2016 को दावा खारिज करते हुए माना था कि सूरजभान ट्रेन में यात्री नहीं थे और उन्होंने नशे की हालत में आत्महत्या की थी। परिजनों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे की जांच रिपोर्ट में सूरजभान के पास दो टिकट होने का उल्लेख था और अंबाला कैंट से पटियाला का टिकट रेलवे कार्यालय से सत्यापित हुआ था। प्रत्यक्षदर्शी का न होना दावा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। शव के पास शराब की बोतल मिलना यह साबित नहीं करता कि उन्होंने शराब पी थी। आत्महत्या की पुष्टि के लिए पुलिस अधिकारी की राय भी पर्याप्त नहीं है।
आदेश के अनुसार, दुर्घटना के समय लागू चार लाख रुपये के मुआवजे पर दावा आवेदन की तारीख से नौ प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज अथवा बाद में निर्धारित आठ लाख रुपये में से जो अधिक हो, उसका भुगतान किया जाएगा। रेलवे को प्रमाणित निर्णय मिलने के तीन महीने के भीतर राशि अधिकरण में जमा करनी होगी। देरी पर अवधि समाप्त होने के बाद वास्तविक भुगतान तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।
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