सतीश नांदल के राज्यसभा चुनाव जीतने पर अपनी ही पार्टी भाजपा से करना पड़ सकता है किनारा, जानिए क्यों
punjabkesari.in Friday, Mar 06, 2026 - 05:04 PM (IST)
चंडीगढ़ (धरणी) : हरियाणा से राज्यसभा की दो सीटों के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जा रहे चुनाव, जिसके लिए नामांकन भरने की अंतिम तिथि गुरूवार 5 मार्च थी। भाजपा की ओर से पिछली 17वीं लोकसभा में करनाल संसदीय सीट से पार्टी के पूर्व सांसद रह चुके संजय भाटिया ने जबकि कांग्रेस की तरफ से अनुसूचित जाति वर्ग से सम्बंधित और हरियाणा सिविल सचिवालय से ग्रुप बी अधिकारी के पद से सेवानिवृत कर्मवीर सिंह बौद्ध ने पार्टी प्रत्याशी के तौर पर अपना-अपना नामांकन भरा। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर सतीश नांदल ने नामांकन दाखिल किया है। नामांकन की जांच शुक्रवार 6 मार्च को होगी, जबकि उम्मीदवारी वापसी का अंतिम दिन 9 मार्च है। मतदान 16 मार्च को निर्धारित है।
इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट और चुनावी-संवैधानिक मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने बताया क़ि अगर 6 मार्च को नामांकन की जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर (आर.ओ.) पंकज अग्रवाल, जो प्रदेश सरकार के सीनियर आई.ए.एस. अधिकारी है, द्वारा सभी नामांकन सही पाए जाते है और सोमवार 9 मार्च तक निर्दलीय प्रत्याशी सतीश नांदल अपनी उम्मीदवारी वापिस नहीं लेते, तो 16 मार्च को मतदान कराना ही होगा जिसमें कुछ भी हो सकता है और क्रॉस-वोटिंग से भी इनकार नहीं जा सकता है।
हेमंत ने बताया कि हरियाणा विधानसभा की 90 सदस्य संख्या के आधार पर राज्यसभा चुनाव में किसी भी उम्मीदवार की जीत के लिए 31 विधायक होने आवश्यक है अर्थात 31 विधायक अगर किसी प्रत्याशी को मतदान में अपनी पहली प्राथमिकता का वोट देते हैं, तभी तो जीत सकता है। वैसे तो कांग्रेस के पास वर्तमान में जीत के लिए जरूरी 31 से 6 अधिक अर्थात 37 विधायक है जिससे कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर कर्मवीर की जीत में कोई अवरोध नहीं लगता परन्तु अगर आगामी कुछ दिनों में इस चुनाव में साम-दाम-दंड-भेद का खेल चला, तो किसी भी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा के पास 48 विधायक है, अर्थात 31 पहली प्राथमिकता के वोटों के बाद उसके पास 17 सरप्लस वोट हैं, तीन निर्दलीय भी भाजपा का समर्थन कर रहे हैं जबकि दो इनेलो विधायक भी नांदल का समर्थन कर सकते हैं चूँकि भाजपा में जाने से पहले नांदल इनेलो के ही वरिष्ठ नेता थे। इस प्रकार अगर 16 मार्च को मतदान हुआ, तो उसमें कुछ भी हो सकता है। बहरहाल इसी बीच हेमंत ने एक ओर रोचक परन्तु महत्वपूर्ण पॉइंट बताते हुए बताया कि सतीश नांदल, जो वर्तमान में हरियाणा भाजपा के पांच प्रदेश उपाध्यक्षों में से एक है, अगर वह निर्दलीय के तौर पर राज्यसभा चुनाव जीत जाते है, तो उन्हें अपनी पार्टी भाजपा से ही किनारा करना पड़ सकता है।
हेमंत ने बताया कि भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(2) (जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है) में स्पष्ट उल्लेख है कि सदन का कोई निर्वाचित सदस्य जो किसी राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के अलावा किसी अन्य रूप में चुना गया है ( अर्थात जो निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीत कर निर्वाचित हुआ हो) यदि वह ऐसे चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। यह पूछे जाने पर कि नांदल तो राज्यसभा चुनाव लड़ते समय ही हरियाणा भाजपा के कुल पांच में से एक प्रदेश उपाध्यक्ष होने के कारण पहले से ही पार्टी के प्राथमिक सदस्य है, तो क्या वह भाजपा में रहते हुए ही निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ सकते हैं, हेमंत ने बताया कि वैसे तो सामान्तय: अगर कोई भाजपा पदाधिकारी या कार्यकर्ता लोकसभा/विधानसभा चुनाव में पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ रहे आधिकारिक पार्टी प्रत्याशी के विरूद्ध निर्दलीय के तौर पर चुनावी मैदान में उतरता है, तो उसके विरूद्ध पार्टी संविधान के अंतर्गत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है परन्तु चूँकि यहाँ एक तो मामला राज्यसभा चुनाव का है और दूसरा नांदल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सहमति से ही निर्दलीय के तौर पर राज्यसभा चुनाव लड़ रहे है, इसलिए पार्टी उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेगी।
उन्होंने बताया कि अगर वैधानिक या संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर देखा जाए, तो हरियाणा भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी सतीश नांदल के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर राज्यसभा चुनाव लड़ने में कुछ गलत नहीं है हालांकि अगर वह निर्दलीय के तौर पर ही चुनाव जीतकर राज्यसभा सांसद निर्वाचित होते है, तो फिर वह न तो भाजपा के सदस्य बने रह सकते हैं और न ही वह अपने छ: वर्षो के राज्यसभा कार्यकाल दौरान भाजपा में शामिल हो सकते हैं.