रसोई गैस के आगे माटी के चूल्हों का मिटता वजूद
punjabkesari.in Monday, Jan 09, 2017 - 10:27 AM (IST)
चरखी दादरी (राजेश): रसोई में गैस के चूल्हों के प्रवेश के बाद कस्बों व गांव-ढाणियों में भी अब गोबर-माटी के चूल्हों का प्रयोग बंद-सा हो गया है। एक जमाना था जब गृहिणियां गोबर-माटी के चूल्हों पर भोजन खासकर सॢदयों में बाजरे की रोटी पकाती थी। चूल्हों में लकड़ी जलाकर भोजन तैयार किया जाता था तथा लकड़ी जलने के बाद कोयले का प्रयोग भी महिलाएं करती थी। हरियाणवी संस्कृति में चूल्हा शब्द का एक अलग ही महत्व रहा है। यहां कहावत रही है कि चूल्हा घर को घर बनाता है तथा जहां चूल्हा नहीं जलता वह घर नहीं अपितु सराय होती है। प्राचीन काल से चूल्हा परिवारों को एक सूत्र में बांधने का काम करता आ रहा है। आज तो आग जलाने के लिए माचिस या लाइटर का प्रयोग किया जाता है पर अब से कुछ वर्ष पूर्व घरों में चूल्हे की आग कभी नहीं बुझती थी।
गृहिणियां चूल्हे पर काम करने के बाद गोबर से बनी थेपड़ी या उपला उसमें ओट देती थी तथा बाद में उसी अग्नि से चूल्हा जलाया जाता था। ग्रामीण इलाकों में वृद्ध हुक्का भी इसी आग का प्रयोग कर भरकर पीते थे मगर आज गैस चुल्हे ने उनका हुक्का भी बंद सा करवा दिया। उस समय चूल्हे में आग बुझ जाना अपशकुन माना जाता था। भोजन पकाने के साथ-साथ सर्दियों में चूल्हे के पास बैठकर आग तापते थे तथा मां-दादी से बतियाते हुए भोजन करते थे। उस समय चूल्हे पर शाम को राबड़ी व गोबर के हारे पर मिट्टी की हंडिया में दाल बनाई जाती थी। चूल्हे पर बनी खिचड़ी और बाजरे की रोटी तो अब एक तरह से अतीत की बात बनकर रह गई है। आज के युग में रसाई गैस के प्रचलन से खाना जल्दी तो जरूर बन जाता है मगर उसमें वह पहले वाला स्वाद ढूंढे से भी नहीं मिलता। गांवों में अब भी बहुत सी गृहिणियां सब्जी-चाय आदि को छोड़कर खाना माटी के चूल्हों पर ही बनाती हैं।
ग्रामीण महिलाएं इस बात को मानती हैं कि गैस पर बनी रोटियों में चूल्हे वाला स्वाद कहीं नहीं है तथा न ही वे रोटियां स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक हैं, लिहाजा भागदौड़ की जिंदगी में समय की बचत के लिए ही इसका प्रयोग करती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में आज भी महिलाएं माटी का चूल्हा रखती है मगर पुत्र बहुओं के कारण मजबूरीवश गैस की रोटी सब्जी खाने पर मजबूर हैं।